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आईसीसी का प्लेटफार्मSubmitted by CommunistIntern... on Mon, 2009-06-01 03:41.
अभी तक ज्ञात सर्वाधिक लम्बे और गहरे प्रतिक्रांति काल के बाद सर्वहारा एक बार िफर वर्ग संघर्ष की राह पा रहा है। यह संघर्ष पहले ही वर्ग द्वारा आज तक लड़े गये संघर्षो में सर्वाघिक व्यापक है। यह छठे दशक के मध्य से विकसित हो रहे व्यवस्था के तीव्र संकट और पुरानी हारों से अपने पूर्वजों की बजाय कम दबी मज़दूरों की नई पीढियों के उदय का नतीजा है। फ्रांस की 1968 की घटनाओं के समय से दुनियॉं भर (इटली, अर्जेन्टीना, ब्रिटेन, पोलैंड, स्वीडन, मिश्र, चीन, पुर्तगाल, अमेरिका, भारत और जपान से लेकर स्पेन तक के) के मज़दूर संघर्ष पूँजीपति वर्ग के लिए दु:स्वप्न बन गये हैं। मज़दूर वर्ग के इतिहास मंच पर पुन: प्रकटन ने प्रतिक्रांति द्वारा उत्पन्न अथवा संभव बनी उन सब विचारधाराओं का निश्चत रूप से खण्डन कर दिया है जिन्होंने सर्वहारा के क्रांतिकारी चरित्र को नकारने की कोशिश की। वर्ग संघर्ष के वर्तमान पुन: उभार ने ठोस रूप से यह सिद्ध कर दिया है कि सर्वहारा ही हमारे युग का एकमात्र क्रांतिकारी वर्ग है।
1929 – 2008 पूँजीवाद दिवालिया है!Submitted by CommunistIntern... on Thu, 2008-11-20 18:34.
रुसी इंकलाब का पतन1917 का रुसी इंकलाब पहले विश्वयुद्व में उभरी सर्वहारा क्रांति की विश्व क्रांतिकारी लहर का सर्वोच्च बिन्दू था। पूंजीवादी चढाव से पतनशीलता के मोड पर स्थित यह वह घड़ी थी जब मज़दूर वरग ने रुस में पूंजी की सत्ता को उखाड फेंका। उसने पूंजी तथा श्रम में विश्वव्यापी मुठभेडों का द्वार खोला। इस अर्थ में यह मज़दूर वरग का अब तक का सर्वाधिक समृद्द तजरूबा था।
‘चीनी क्रान्ति’ परआधिकारक इतिहास मुताबिक 1948 में चीन में लोकप्रिय इंकलाब विजयी रहा। जनतंत्रवादी पश्चिम एवम माओवादी दोनो इस विचार के बराबर पक्षधर हैं। यह स्तालिनवादी प्रतिक्रांति जनित तथाकथित “समाजवादी देशों” की रचना विषयक विशाल भ्रमजाल का हिस्सा है। यह तय है कि 1919 और 1927 के बीच चीन महत्वपूर्ण मज़दूर आंदोलन में से गुज़रा जो उस बक्त दुनिया को हिलाती अंतर्राष्ट्रीय लहर का अभिन्न हिस्सा था। पर यह आंदोलन मज़दूर वरग के संहार द्वारा डूबो दिया गया। पूंजीवादी प्रचारक जिसे “चीनी इंकलाब की विजय” के रूप में पेश करते हैं वह केवल राज्यपूंजीवादी शासन के माओवादी रूप की स्थापना थी। यह सर्वहारा क्रांति की हार के बाद 1928 से चीन में भडके साम्राज्यवादी युद्व के दौर का चरम था।
2003 का इराक युद्धएक बार फिर मध्यपूर्व आतंक की गिरफ्त में है। एक बार फिर इराक पर बंमों की आग बरसाई जा रही है। एक तरफ “सभ्य” ताकतें पहले ही भुखमरी की शिकार आबादी पर मौत तथा बदहाली बरपा कर रही हैं। दूसरी ओर सारी दुनिया को झूठों की बाढ में डुबोया जा रहा है। ताकि जंग उचित ठहराई जा सके। ताकि जंग के हर सच्चे विरोध को विकृत तथा भ्रमित किया जा सके।…
अफगान युद्ध6000 अमेरिकी नागरिकों को मौत के घाट उतारते 11 सितंबर 2001 के घिनोने अपराध के जवाब में अमेरिका तथा उसके मित्र अफगानिस्तान पर हमला करके और भी घिनोने कहर बरसा रहे हैं।
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