ओवामा प्रशासन की विदेश नीति - दोस्ती का मुक्का

अमेरिकी साम्राज्यवाद दुनियां भर में तथाकथित दोस्तों और दुश्मनों से समान रूप से उत्तरोतर समस्याओं से धिरता चला जा रहा है। बुश प्रशासन की "अकेला चलो'' की नीति के बाद, 18 महीने पहले हुये ओवामा के चुनाव से यह अनुमान था कि अंतर्राष्ट्रीय अखाडे में वह दाँव पेच के लिये ठोस घरातल स्थापित करने के लिये समय का जुगाड कर लेगा। ओवामा की एक "शांति दूत'' की छवि और उसके प्रशासन की "सहयोग'', "सुलह समझौता'' और कूटनीति की कार्य प्रणाली सभी प्रमुख, खास तौर पर दुसरे नम्बर की, सैनिक ताकतों को अपने सैनिक प्रयास के साथ खडा करने की कोशिश थी ताकि वह अपने दुश्मनों की ओर "हाथ बढा'' स्के। जैसा कि 2009 के बसन्त के इन्टरनेशनल रिव्यू 139 में अंतराष्ट्रीय स्थिति पर प्रकाशित लेख में कहा गया है, ओवामा के चुनाव के वाबजूद अमेरिका का "लक्ष्य अभी भी सैनिक श्रेष्ठता के माध्यम से विश्व पर अमेरिका का नेतृत्व स्थापित करने का है। कूटनीति के प्रति ओवामा की बढती अभिरुचि एक अहम अवस्था तक समय हासिल करने तथा उस सम्बन्ध में अपनी सेना, जो वर्तमान में इतनी अधिक पतली फैली और इतनी थक हुई है कि वह अब इराक तथा अफगानिस्तान के साथ साथ किसी अन्य क्षेत्र में युद्ध लडने की हालत में नहीं, को भविष्य में अनिवार्य हस्तक्षेप के लिये समय तथा जगह प्रदान करना है।''

अब यह प्रतीत होता है कि ओवामा द्वारा घोषित विनियोजन, सहयोग तथा कूटनीति की नीतियों ने, यदि उनका कभी अस्तित्व भी रहा हो, अब बुश की मंडली की नीतियों को जगह दे दी है। बल्कि विश्व परिस्थिति की बढती खतरनाक मांगो के अनुरूप उन्हें विस्तृत और परिस्कृत किया जा रहा है। इस प्रकार लम्बी अवधि में वे विश्व को, जिसे वे नियंत्रित करना चाहते हैं, अस्थिर बनाये रखने में योगदान करेंगी। यदि कोई घटना इस विकास क्रम को प्रदर्शित करती है तो वह है: इस वर्ष के प्रारम्भ में आये भूचाल के पश्चात हैती पर अमेरिकी हमला, जहां अन्य सरकारों तथा अन्य एजेंन्शियों द्वारा अमेरिका के पिछवाडे में हस्तक्षेप के सभी प्रयासों को अमेरिका ने ठोंक दिया। यह अन्य ताकतों के लिये स्पष्ट एवं नृशंस सन्देश था।

अलावा इसके कि इराक से अमेरिकी सेना की वापसी पर ठहराव लगाया जा रहा है और अफगानिस्तान में 30,000 अतिरिक्त सैनिकों का एक "उभार'' अपनी शुरूआत में है, अनेक तत्व हैं जो अमेरिकी साम्राज्यवाद की बढती आग्रहता की जरुरत की ओर इशारा करते हैं। बुश के एकतरफावाद के सिद्धान्त से स्पष्ट संबंध विछेध के रूप में प्रस्तुत नयी अमेरिकी रणनीति एक 52 पन्नों की रिपार्ट में पेश की गयी थी। इसे "मन वांछित दुनिया प्राप्ति का ब्लू प्रिन्ट'' शीर्षक से व्हाइट हाउस की वैब साइट पर चस्पा किय गया था और यह ओबामई भाषा से भरी पडी है। मसलन उसमें  कहा गया है कि "हमारी दीर्घकालीन सुरक्षा लोगों को डराने की हमारी योग्यता में नहीं बल्कि उनमें आशा जागृत करने की हमारी क्षमता में निहित है।'' इस नीति का झुकाव चीन, भारत और रूस को संलग्न करना है किन्तु साइबर आतन्कवाद का खतरा रिपोर्ट की सूची में सबसे ऊपर रखा गया है और इस हथियार का प्रयोग विशेष रूप से चीन करता है। अफगगनिस्तान मे अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा और पाकिस्तान से उसके तनाव पूर्ण रिश्तों के संबन्ध में अमेरिका ने हाल ही में भारत को ऐसा करारा झटका दिया है कि भारत के पूंजीपति वर्ग को प्रति उत्तर प्रकाशित करने के लिये मजबूर होना पडा और सांत्वना के लिये रूस की ओर दौडना पडा। अमेरिका का रूस के साथ काकेशस में तनाव चल ही रहा है। यह किर्गिस्तान में अशांति, जिसके परिणाम स्वरूप किरिगिस्तान की सरकार का पतन हुया, के दौरान और भडक उठा। किरिगिस्तान में अमेरिका तथा रूस दोनों के हवाई अड्डे हैं।

बुश शासन के साथ बुनियादी निरन्तरता प्रदशित करते हुये रिपोर्ट फिर अमेरिका के एकतरफा कार्यवाही करने के अधिकार को सुरक्षित रखती है और पूर्वक्रय और अनुकरणीय प्रतिकारमय हमलों को खारिज नहीं किया गया है। यह नीति हर जगह सैनिक श्रेष्ठता बनाये रखेगी तथा "जनतनत्र और मानवाधिकार'' को प्रोत्साहित करेगी जो कि चीन,  ईरान एवं उत्तरी कोरिया के विरुद्ध निर्देशित है। यह बुश की नीतियों से सम्बन्धित "वही घिसी पुरानी" नीतियां नहीं हैं बल्कि उनका और अधिक परिष्कृण हैं ताकि उन्हें और अधिक अस्थिर परिस्थितियों में अमेरिकन सीम्राज्यवाद के लिये और अधिक कारगर बनाया जा सके। गत वर्ष के अंत में,  इसे रेखांकित करते हुये अमेरिकी केन्द्रीय कमान्ड के मुखिया जनरल पेट्रयस ने सेना को गुप्त सैनिक अभियानों पर अधिक व्यापक तथा स्थायी रुप  से भेजने के लिये एक आदेश पर हस्ताक्षर किये। स्पष्ट रूप से बिवरण अभी अपूर्ण है किन्तु द् गार्जियन (25/5/10) ने लिखा: अमेरिका की सैनिक टुकडियां इरान, यमन, सीरिया, सोमालिया सऊदी अरब और अन्य स्थानों पर कार्यरत हैं। इरान अमेरिका और ब्रिटेन पर लगातार यह आरोप लगा रहा है कि वे क्षेत्रीय जातीय समूहों में असंतोष फैलाने के लिये विशेष सेना को भेज रहे हैं जबकि वे अपने सैनिक अभियान छेडे हुये हैं। द् वाशिंगटन पोस्ट (5/6/10) ने जानकारी  दी कि बीते वर्ष के शुरू में ओवामा के पदारूढ होने के समय 60 के मुकाबले में अमेरिका ने अब 70 स्थानों पर अपनी विशेष सेनायें तैनात कर रखी हैं। अखबार आगे लिखता है: ओवामा के अधीन विशेष सैनिक अभियानों के लिये बजट बढाया गया है और बुश शासन के मुकाबले में व्हाइट हाउस में विशेष अभियानों के कहीं अधिक कमांडर उपस्थित हैं। एक अज्ञात अफसर ने कहा कि अब ''वे बातें कम और काम अधिक कर रहे है।'' और इस दिशा में, फारस की खाडी, लाल सागर और हिन्द महासागर के भागों में विशाल रूप से सैनिक क्षमताएं बढाते हुये अमेरिका के पांचवें वेडे ने अपने क्षेत्र का विस्तार किया है।

कूटनीति के रूप में युद्ध

रम्सफील्ड मुताबिक गुप्त सैनिक अभियानों के "प्रत्यक्ष रूप से गुप्त'' में रूपान्तरण की स्वीकृति देते हुये प्रशासन ने साफ कर दिया है कि यह अमेरिका की अपने दुश्मनों पर युद्ध की और ''दोस्तों'' के लिये एक चेतावनी की घोषणा है। ओवामा प्रशासन कूटनीति का भी इसी तरीके से प्रयोग कर रहा है -  युद्ध के एक पहलू, साम्राज्यवाद के एक पहलू के रूप में कूटनीति का प्रयोग। इस प्रकार, जब जापान के नये नेता, जिसने गत अगस्त में अपनी डैमौक्रैटिक पार्टी के लिय चुनाव में भारी विजय हासिल की थी, ने अमेरिका के बन्धन को ढीला करते हुये और अधिक स्वतंत्र भूमिका का प्रस्ताव रखा और जापान में अमेरिकी अड्डा बन्द करने का सुझाव दिया (शायद गंभीरता पूर्वक नहीं) तो अमेरिकी प्रशासन ने इसको, विशेषकर जापान के द्वारा चीन के साथ नजदीकी सम्बन्धों की बातचीत को, लेकर तीव्र कूटनीतिक प्रति उत्तर दिया। प्रधान मंत्री यूकियो हतोयामा को उसकी वाशिंगटन यात्रा के दौरान सार्वजनिक तौर पर अपमानित किया गया; अमेरिकी मीडिया के अनुसार ओवामा ने उसे सूचित किया कि "उसके लिए वक्त खतम हो रहा हैं।''  अमेरिका की कूटनीनिक धौंस धपाड, गाली गलौज तथा जापान एशिया-शान्तमहसागर क्षेत्र के लिए परिणामों के विषय में दी गयी चेतावनियों को बढा चढा कर दिखाने के कारण हतोयामा टूट गया और अफसोसपूर्ण मुद्रा में पटरी पर आ गया। और यह सब जनतंत्र तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिये!

इसी प्रकार, हाल ही में,  अमेरिका ने ब्राजील और टर्की द्वारा इरान के साथ उसका यूरेनियम टर्की भेजने का समझौता करने को लेकर दोनों को करारी चपत लगायी, बाबजूद इसके कि यह समझौता संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा तैयार की गयी योजना के समान था जिसे स्वीकार करने के लिये पिछले वर्ष अमेरिका और उसके "साथियों'' ने तेहरान को कहा था। ये थे दोस्ती के लिये बढे हुये हाथ! ब्राजील और टर्की ने इरान के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ के नये दंडात्मक पैकज, जिसके लिए  अमेरिका पिछले पांच महीने से काम कर रहा था, के विरुद्ध मतदान किया। इस पैकेज में शामिल है "आर्थिक नाकेबंदी, एक विस्तृत शस्त्र निषेध तथा यू ऐन के सदस्य राज्यों को इरान की गतिविधियों पर नजर रखने की चेतावनी। इरान की शिपिंग कम्पनी  को निशाना बनाया गया, और यही उन निकायों के प्रति किया गया जो क्रान्तिकारी सुरक्षा गार्डों द्वारा नियंत्रित हैं और जो कि इस्लामिक राज्य की रीढ और इसके  परमाणु कार्यक्रम के रखवाले हैं।" ( गार्जियन 10/6/10 ) विगत प्रशासन में बुश द्वारा नियुक्त स्टेट सैक्रेटरी गेटस ने अमेरिका को और अधिक आर्थिक एवं सैन्य सहायता उपलव्ध न कराने तथा यू ऐस को और अधिक ठोस रूप में मदद न करने के लिये यूरोपीय शक्तियों को फटकारने के लिये कूटनीतिक माध्यमों को प्रयोग किया। वैसे मदद की कम ही सेभावना है जबकि उनके हाथ एक दूसरे की गर्दन की ओर बढ रहे हों।

मुश्किल, मुश्किल, मुश्किल

अफगानिस्तान, पाकिस्तान और इराक में युद्धों के अलावा सामरिक महत्व के इस केन्द्रीय क्षेत्र में, इरान, टर्की तथा इजरायल द्वारा पेश बढती समस्याएँ हैं। रूसी गुट के 1989 में पतन के पश्चात छोटी ताकतों के बढते प्रभाव को रेखांकित करता, इजरायल के साथ झगडा संभवतया अधिक गंभीर है। नयी और बडी बस्तियों के निर्माण के सवाल पर पूर्ण अवज्ञा के पश्चात, कथित "गाजा को मदद'' जहाज, मावी मामारा पर हाल की हत्यायों पर सम्बन्ध और अधिक खराब हो गये हैं। अमेरिकी कूटनीति यह प्रदर्शित करने में असाधारण तौर पर आगे चली गयी कि उसने इजरायल को  "छह जहाजी बेडे के साथ संयम बरतने'' की चेतावनी दी थी(द् आब्जरवर 7/6/10)। अमेंरिका के स्टेट डिपार्टमैंट ने कहा: "हमने जहाजी बेडे के बारे में कितनी बार सूचना दी। हमने सावधानी और संयम पर जोर दिया'''। इजरायल में अमेरिका के पूर्व राजनयिक ने 5 जून को वाशिंगटन पोस्ट में तर्क किया कि अमेरिका के लिये इजरायल एक बिल्कुल ही विपरीत दिशा में चलने वाला साथी है। उसी प्रकार,  टर्की भी इस क्षेत्र में एक सामान्य तथा अधिकाधिक खतरनाक अफरा-तफरी के हालात में अमेरिका से दूर होती दिशा को सुदृढ करता दिखलाई देता है। इराक के साथ युद्ध में अमेरिकी फौजों को अपने इलाके से गुजरने की इजाजत देने से इनकार करने से लेकर, टर्की इरान और सीरिया के साथ अपने सम्बन्धों में अधिक स्वतंत्रत दिशा जाहिर कर रहा है। मावी मामारा पर हमले में बहुत से तुर्क नागरिकों के मारे जाने के पश्चात, अमेरिका द्वारा मध्यस्त टर्की इजरायली गठगन्धन अब पानी में डूबता दिखाई देता है जबकि टर्की फिलिस्तीन-परस्त दुनियां में एक उभरती हुई शक्ति की भूमिका अपनाता दिखाई देता है।

यहां हार्न आव अफ्रीका और उसके आस पास कथित "संकट का वृतांश'' भी है जो विश्व के "गर्म स्थल'' बनने की संभावना रखता है। इथोपियाई सैन्यवाद में अमेरिका और ब्रिटेन की संलग्नता का उल्टा असर हुआ है। नतीजतन, सारे क्षेत्र में अस्थिरता का माहौल है जिसने अल कायदा तथा अन्य आतंकवादी ग्रुपों के लिये उर्वरक भूमि तैयार की है। इथोपिया, इरीटीरिया, सूडान ओर सोमालिया के बीच स्थानीय दुश्मनियां अंतर संबन्धित हैं और बडी साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा इस्तेमाल की जा रही हैं। खाडी के पार अमेरिकन साम्राज्यवाद के लिये अधिकाधिक रिसता हुआ घाव यमन है जिसे अमेरिका तथा ब्रिटेन ने उस देश में अपनी बढती रुचि से संभवतया और खराव कर दिया है। यहां से आतंकवादियों और कट्टरपंथी ग्रुपों के लिये एक सशक्त मार्ग है। उनमें से कुछ आपस में गठजोड कर रही हैं, हॉर्न ऑफ अफ्रीका के गिर्द गुज़रते हुए, उत्तरी केन्या, खाडी तथा सऊदी अरब को अपनी लपेट में  ले रही हैं; अमेरिकी शैरिफ द्वारा नियंत्रित करने के लिये यह एक समूचा कानून विहीन क्षेत्र है।

इस क्षेत्र से दूर, अमेरिका के लिये एक और समस्या मार्च में उत्तरी कोरिया के तारपीडो द्वारा दक्षिणी कोरिया के जहाज को डुबा देने में दिखाई दी। उर्पयुक्त उदाहरणों का इशारा किस ओर है? ये सभी उदाहरण यह सिद्ध करने के लिये काफी हैं कि छोटे लुटेरे अमेरिकी गॉड फादर को अपनी सीमाओं तक धकेलने की ओर प्रोलोभित होंगे और अमेरिका के "मित्र'' अपने स्वार्थों को ध्यान में रखते हुये कम भरोसेमन्द बन जायेंगे। साम्राज्यवादी प्रतिद्वन्दता के इस विवेकहीन घालमेल में घटनायें और दुर्धटनायें  अमेरिका के नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं, और यह अमेरिका पर और अधिक दवाब डालेगा। एक चीज निश्चित हैः अमेरिका, अगर ओवामा की प्रिय "मानवीय'' शब्दावली का प्रोयग करें तो, "शांति और मेलमिलाप'' की भाषा में उत्तर नहीं देगा। वह तो सैन्यवाद तथा युद्ध की खूंखार ताकत से प्रतिउत्तर देगा। इस प्रकार वह स्थिति को और अधिक खतरनाक तथा विश्व फलक पर साम्राज्यवादी टकरावों को कई गुना बढाने के और अनुकूल बना देगा।

बबून, 9 जून 2010, वर्ल्ड रेवोल्यूशन 335, जून 2010