लंदन में छात्र मजदूर प्रर्दशन

हमें अपने स्वयं के संघर्ष को नियंत्रित करने की जरूरत है!

नीचे जो पर्चा दिया जा रहा है वह सोमवार 15 नवम्बर को वाम पक्ष के संगठनों के संरक्षण में किंग्स कालेज में हुयी सभा के दौरान बांटा गया था .आने वाले सप्ताह के 'संघर्ष दिवस' के लिए, हम सुझावों, समालोचनाओं और उससे भी बढकर इसे वितरित करने या बेहतर व अद्वतन करने का स्वागत करते हैं.

आई सी सी के टुलोज सेक्शन, जो कि प्रदर्शनों के दौरान हुयी सभाओं व समितियों में काफी सक्रिय था, का एक कॉमरेड मीटिंग में बोल पाया और  फ्रांसीसी यनियनों की रणनीति की आलोचना के बावजूद उसने बडे पैमाने पर तारीफ हासिल की. हम उस सभा के कुछ और बिन्दुओं को रखने की कोशिश करेंगे.

ब्रिटेन में काफी वक्त से यह लग रहा था  कि नई सरकार की निर्दयी व हमलावर नीतियों ने मजदूर तबके को आहत करके खामोश कर दिया  है.

इसमें अपाहिजों को काम के लिये मज़बूर करना, बेकारों को खाली काम पर भेजना ,  पेंशन की उम्र में इजाफा, शिक्षा के क्षेत्र में वहशियाना कटौती, पब्लिक सेक्टर में हजारों नौकरियों का चले जाना, विश्वविद्वालयों की फीस को तिगुना करना व 16-18 साल के छात्रों के शिक्षापूर्ति भत्ते में भारी कटौती.......ये फेहरिस्त अंतहीन है. मजदूर तबके (बी ए, टयूब, अग्निसेवा आदि) के ताजा संघर्षों को सख्ती से अलग-थलग कर दिया गया.

पर हम एक अंतरराष्ट्रीय वर्ग हैं और यह संकट भी अंतरराष्ट्रीय है। इन कठोर कदमों के खिलाफ ग्रीस, स्पेन और फ्रांस में ताजातरीन व भारी संघर्ष हुए हैं.  फ्रांस में पेंशन सुधारों को लेकर हुयी प्रतिक्रिया ने समाज खास कर युवाओं का थ्यान केंद्रित किया है.

लंदन में हुए भारी प्रदर्शन ने दिखा दिया है कि उसी तरह की खिलाफत ब्रिटेन में भी मौजूद है. प्रदर्शन के भारी रुप ने, उसमें छात्रों व शिक्षाकर्मिंयों की भारी भागीदारी ने, प्रदर्शन को जगह ए से  जगह बी के बीच एक दमहीन प्रदर्शन तक  सीमित करने के प्रस्ताव को ठुकराकर यह दिखा दिया है कि वे जीवन निर्वाह के साधनों में कमीं करने के संबंध मे राज्य के किसी तर्क को नही मानेंगे.

टोरी हेड क्वार्टर पर आरजी नियंत्रण  मुटठी भर अराजकतावादियों की साजिश ना थी बल्कि छात्रों व मजदूरों की बडी तादाद के गुस्से का उत्पाद था और प्रदर्शन के समर्थक छात्रों व मज़दूरों के विशाल बहुमत ने इस कदम की एनयूएस के  नेतृत्व व मीडिया द्वारा की निन्दा को मानने से इनकार कर दिया.

बहुतों ने कहाः यह प्रदर्शन मात्र शुरूआत था.  इसी तरह की प्रतिक्रिया व प्रदर्शन का दिन 24 नवम्बर को होना है. वक्ती तौर पर यह प्रदर्शन आधिकारिक' संगठनों जैसे की एनयूएस जो पहले भी दिखा चुका था कि वे आदेश देने वाली ताकतों का हिस्सा हैं द्वारा संगठित किये जा रहे हैं। पर यह प्रदर्शन में बडी तादाद में ना शामिल होने का कोई कारण नहीं। दूसरी तरफ, बडी तादाद में साथ आना संघर्ष की सही ज़रूरत को जाहिर करने का व नये प्रकार के संगठन पैदा करने का सही आधार हैं.

ऐसे प्रदर्शनों व 'संघर्ष दिवसों' से पहले, हमें आगे कैसे बढना है?  हमें स्कूल कालेजों विश्वविद्वालयों में वार्ताएं आमसभाएं आदि आयोजित करने की ज़रूरत हैं ताकि प्रदर्शन के लिए जरूरी मदद व इसके मकसदों पर गौर किया जा सके. हमें प्रदर्शनों में 'आमूल परिर्वतनवादी छात्र मजदूर ब्लाक'  बनाने की कुछ कॉमरेडों की शुरूआत का सर्मथन करना चाहिए. लेकिन जहां तक मुम्किन हो उन्हे पहले ही से मिल कर तय कर लेना चाहिए कि आधिकारिक संगठनों से अपनी आजादी का इजहार कैसे करेंगें.

ग्रीस के ताजा तजरबे से सीखने की जरूरत है जंहा कब्जा करने ( जिसमें यूनियनों के  हेड क्वार्टर पर कब्जा करना भी शामिल है) को जगह बनाने में इस्तेमाल किया गया ताकि वंहा आम सभाएं की जा सकें. और फ्रांस का क्या तजुर्बा था? हमने अल्पसंख्यक छात्रों व मजदूरों को छोटे कस्बों की गलियों में सभाएं करते देखा ना केवल प्रदर्शन तक बाल्कि निरन्तरता के आधार पर जब आंदोलन आगे बढ रहा था.

हमें यह भी साफ करने की जरूरत है कि आदेश देने वाली ताकतें 10 नवम्बर वाली कोमल सोच भविष्य में नहीं रखेंगीं। वे इस वास्ते तैयार हो चुके होंगे कि हमें अल्पविकसित टकरावों के लिए भडकाऐं ता कि हम उन्हें ताकत दिखाने का मौका दे देंगें. फ्रांस में यह एक आम तरकीब है. शोषक ताकतों के खिलाफ एकता दिखाने के आत्म-रक्षा संगठन के लिए जरूरी है कि वे सामूहिक विचारविमर्श व फैसले के साथ बाहर आएं.

यह संघर्ष सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में नही है. पूरा मजदूर तबका ही निशानें पर है. लिहाजा प्रतिरोध को पब्लिक व निजी दोनों क्षेत्रों में बारीकी से फैलाने की जरूरत है. अपने खुद के संघर्षों को नियंत्रित करना ही उन्हे बढाने का एकमात्र रास्ता है

आईसीसी 15/10/2010