पूँजीवाद कर्ज में क्यों डूब रहा है?

विश्व अर्थव्यवस्था रसातल के कगार पर लगती है। 1929 से भी बदतर एक भारी मंदी का खतरा सदैव बढ़ रहा है। बैंक, व्यापार, नगर पालिकाएँ, क्षेत्र और यहां तक कि राज्य दिवालियेपन के रुबरु हैं। और एक चीज़ जिसकी मीडिया अब बात नहीं करता वह है जिसे वे 'कर्ज संकट' कहते हैं।

जब ऋण की दीवार से होता है पूँजीवाद का सामना

निम्न चार्ट वैश्विक कर्ज में 1960 से अब तक हुए परिवर्तन को दर्शाता है। (यहां जिक्र है दुनिया के कुल ऋण का,  अर्थात परिवारों, व्यवसायों और सभी देशों के राज्यों का ऋण)। यह ऋण दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया गया है।

                                                      

ग्राफ़ 1

इस चार्ट के अनुसार, 1960 में कर्ज विश्व के सकल घरेलू उत्पाद के बराबर (यानी 100%) था। 2008 में यह 2.5 गुना अधिक (250%) था। दूसरे शब्दों में,  आज ऋण की पूर्ण अदायगी विश्व अर्थव्यवस्था द्वारा ढाई साल में उत्पादित तमाम संपदा को निगल जाएगी।

तथाकथित "विकसित देशों" में यह परिवर्तन नाटकीय है, जैसाकि निम्न ग्राफ में, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के सार्वजनिक ऋण का प्रतिनिधित्व करता है,  में दिखाया गया है।

                                               

 

ग्राफ़ 2

हाल के वर्षों में, सार्वजनिक ऋण का संचय ऐसा है कि पिछले ग्राफ पर परिवर्तन को दिखाती वक्र रेखा अब एक खडी लाइन है! यही है जिसे अर्थशास्त्री "ऋण की दीवार" कहते हैं। यही वह दीवार है जिससे पूँजीवाद टकरा गया है।

ऋण,  पूँजीवाद के पतन का एक उत्पाद

यह देखना आसान था कि विश्व अर्थव्यवस्था अंतत: इस दीवार से टकरा जाएगी; यह अपरिहार्य था। तो क्यों दुनिया की सरकारों ने,  वे चाहे वामपंथ की रही हों या दक्षिणपंथ की, अति वामपंथ की रही हों या अति दक्षिणपंथ की,  तथाकथित "उदारवादी" रही हों या "राज्यवादी", सभी ने आधी से अधिक सदी से कर्ज़ सुविधाओं को फैलाया है, बडे बजट घाटे झेले हैं, सरकारों, कम्पनियों तथा परिवारों के कर्ज़ों की बढोतरी की सक्रिय हिमायत की है? जवाब आसान है: उन के पास कोई विकल्प नहीं था। अगर वे ऐसा नहीं करतीं तो वह भयानक मंदी जिसमे हम अब प्रवेश कर रहे हैं, 1960 के दशक में ही शुरू हो जाती। सच में, पूँजीवाद दशकों से कर्ज़ पर जीवित रखा गया है। इस परिघटना के मूल को समझने के लिए हमें उस चीज़ को भेदना होगा जिसे मार्क्स ने "आधुनिक समाज का महान रहस्य : अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन"  कहा। इसके लिए हमें एक छोटा सा सैद्धांतिक घुमाव लेना होगा।

पूँजीवाद हमेशा से अपने भीतर एक जन्मजात रोग लेकर चला है: वह एक विष बहुतायत में पैदा करता है जिसको वह समाप्त नहीं कर सकता: अति-उत्पादन। वह इतनी वस्तुएँ पैदा करता है जो बाजार मे खप सकने से अधिक हैं। क्यों? चलो एक सरल उदाहरण लेते हैं: एक मजदूर एक एसेम्बली लाइन पर या एक कंप्यूटर पर काम कर रहा है और महीने के अंत में 800 रुपये पाता  है। वास्तव में, उसने 800 रुपये, जो वह पाता है, के बराबर उत्पादन नहीं किया है, बल्कि उसने 1600 रुपये के मूल्य का उत्पादन किया। उसने अवैतनिक काम किया, या दूसरे शब्दों में, बेशी मूल्य का उत्पादन किया। पूँजीपति उस 800 रुपये के साथ जो उसने मजदूर से चोरी किये हैं  (यह मानते हुए कि वह सभी वस्तुओं को बेचने में कामयाब रहता है) क्या करता है? वह एक हिस्सा, मान लीजिये 150 रुपया, निजी उपभोग के लिए आवंटित करता है। शेष 650 रुपया वह कंपनी की पूँजी  में फिर से निवेश करता है, बहुधा और आधुनिक मशीनें आदि खरीदने में। लेकिन पूँजीपति ऐसे व्यवहार क्यों करता है? क्योंकि वह आर्थिक रूप से ऐसा करने को मजबूर है। पूँजीवाद एक प्रतिस्पर्धी प्रणाली है और उसे अपने उत्पादों को अपने प्रतिद्वंद्वी से, जो उसी प्रकार के उत्पाद बनाता है, अधिक सस्ते बेचने होंगे। परिणाम स्वरूप, नियोक्ता को न केवल अपनी उत्पादन लागत, यानि कि मजदूरी, कम करनी होगी बल्कि मजदूर के अवैतनिक काम को बढाना होगा ताकि मुख्यता अधिक कुशल मशीनरी मे निवेश करके उत्पादकता बढ़ाई जा सके। अगर वह यह नहीं करता है तो वह आधुनिकीकरण नहीं कर सकता, और देर सवेर उसका प्रतिद्वंद्वी, जो यह सब कर लेगा और अधिक सस्ता बेचेगा, बाजार जीत लेगा। पूँजीवादी व्यवस्था एक अन्तर्विरोधी परिघटना से प्रभावित है : यह श्रमिकों को वास्तव में किए गए काम के बराबर भुगतान नहीं करती, और नियोक्ताओं को निचोडे मुनाफे के अधिकतर भाग का उपभोग त्यागने को मज़बूर करके, व्यवस्था बांटने की अपनी क्षमता से अधिक मूल्य पैदा करती है। न तो मजदूर, और न ही पूँजीपति और मजदूर संयुक्त रुप से तमाम उत्पादित मालों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए पूँजीवाद को अपने अतिरिक्त मालों को अपने उत्पादन क्षेत्र के बाहर ऐसे बाज़ारों मे बेचना होगा जिन्हें पूँजीवादी संबंधों ने अभी विजित नही किया हो - तथाकथित 'अतिरिक्त पूँजीवादी बाजार' । यदि वह इसमें सफल नहीं होता, तो अति-उत्पादन का एक संकट पैदा हो जाता है।

यह मार्क्स द्वारा 'पूँजी' और रोजा लक्ज़मबर्ग द्वारा 'पूँजी का संचय' में निकाले गये निष्कर्षों में से चन्द का कुछ लाइनों में सारांश है। निचोड के रुप में, यह रहा अति उत्पादन के सिद्धांत का एक संक्षिप्त सारांश:

*  पूँजी अपने मजदूरों का शोषण करती है (यानी मजदूरों की मजदूरी उनके काम द्वारा पैदा वास्तविक मूल्य से सदा बहुत कम होती है)।

*  इस प्रकार पूँजी अपने मालों को मुनाफे पर, एक ऐसी कीमत पर बेचती है जो मजदूरों की मजदूरी और बेशी मूल्य से अधिक होती है और जिसमें उत्पादन के साधनों का मूल्यह्रास भी शामिल होता है। लेकिन सवाल यह है कि किसे?

*  जाहिर है, श्रमिक माल खरीदते हैं ... अपनी पूरी मजदूरी का उपयोग करके। यह अभी भी बिक्री के लिए बहुत छोड़ देता है। इसका मूल्य अवैतनिक श्रम के बराबर है। इसी में पूँजी के लिए मुनाफा उत्पन्न करने की जादूई ताकत है।

*  पूँजीपति भी उपभोग करते हैं... और वे भी आम तौर पर ऐसा करने बाबत बहुत दुखी नहीं होते। लेकिन वे अकेले बेशी मूल्य को समाहित किए तमाम मालों को नहीं खरीद सकते। न ही इसका कोई मतलब होगा। पूँजी मुनाफे के लिए स्वयं अपने से ही अपने मालों को नहीं खरीद सकती; यह अपनी दांईं जेब से पैसे ले कर अपनी  बाँई जेब में डालने की तरह होगा। यह करके कभी किसी का कोई भला नहीं हुआ -   हर गरीब इसकी गवाही दे देगा।

*  संचय और विकास के लिए, पूँजी को मजदूरों और पूँजीपतियों के अलावा खरीददारों को खोजना होगा। दूसरे शब्दों में,  पूँजीपति के लिए अपनी प्रणाली के बाहर बाजारों को खोजना जरूरी है, अन्यथा ना बिकने वाले माल उसके हाथों में रह जाते हैं और पूँजीवादी बाजार को अवरुद्ध करते हैं; तो यही "अति उत्पादन का संकट" है!

यह "आंतरिक अंतर्विरोध" (अति-उत्पादन की स्वाभाविक प्रवृत्ति और बाहरी बाजारों की निरंतर तालाश की आवश्यकता) अपने अस्तित्व के प्रारंभिक दौर में व्यवस्था की अविश्वसनीय प्रेरणा शक्ति की जड़ों में से एक है। 16वीं सदी में अपने जन्म के समय से ही पूँजीवाद को अपने को घेरे सभी आर्थिक क्षेत्रों से वाणिज्यिक संबंध स्थापित करने पडे : पुराने शासक वर्गों, किसानों और दुनिया भर के कारीगरों के साथ। 18वीं और 19वीं शताब्दियों में प्रमुख पूँजीवादी शक्तियाँ दुनिया को जीतने की दौड़ में लगी हुयीं थीं। उन्होने धीरे-धीरे धरती को उपनिवेशों में बांट लिया और असली साम्राज्यों की स्थापना की। कभी कभी, उन्होने खुद को एक ही क्षेत्र के लिए ललचाते पाया। कम शक्तिशाली ताकतों को पीछे हटना और जाकर कोई अन्य क्षेत्र तलाशना पडा जहां वे लोगों को अपने मालों को खरीदने के लिए मजबूर कर सकें। इस प्रकार पुरानी अर्थव्यवस्थाएँ धीरे-धीरे रुपांतरित और  पूँजीवाद मे एकीकृत कर दी गईं। उपनिवेशों की अर्थव्यवस्थाएँ न केवल यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के मालों के लिए बाजार उपलब्ध कराने के कम से कमतर सक्षम होतीं गईं हैं,  इसके उल्ट वे भी वही अति-उत्पादन पैदा करती हैं।

18वीं और 19वीं शताब्दी में पूँजी की इस गतिशीलता को,  अति-उत्पादन के संकटों और समृद्धि एवम विस्तार के लंबे कालों के क्रमांतरण को और अपने पतन की ओर पूँजीवाद के अनवरत प्रगमन को मार्क्स और एंगेल्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में बखूबी वर्णित किया है : "इन संकटों में, एक महामारी, अति-उत्पादन की महामारी फूट पडती है जो किसी भी अन्य युग में अनर्गल लगती। समाज अचानक अपने आप को क्षणिक बर्बरता की अवस्था मे वापस पाता है; ऐसा प्रतीत होता है जैसे एक अकाल ने, तबाही के एक सार्वभौमिक युद्ध ने निर्वाह के तमाम साधनों की आपूर्ति काट दी हो; उद्योग और वाणिज्य नष्ट हुए लगते हैं; और क्यों?  क्योंकि वहाँ बहुत ज्यादा सभ्यता, निर्वाह के बहुत साधन, बहुत ज्यादा उद्योग, बहुत ज्यादा वाणिज्य है"।

उस समय, क्योंकि पूँजीवाद अभी विस्तार की अवस्था में था और अभी नए क्षेत्रों को जीत सकता था, लिहाज़ा हर संकट बाद मे समृद्धि के एक नए दौर की ओर ले जाता था। "अपने उत्पादों के लिए लगातार फैलते बाजार की जरूरत पूँजीपति वर्ग का समूची धरती पर पीछा करती है। उसे हर जगह बसना, हर जगह जमना, हर जगह संबंध स्थापित करने होंगे..। उसके मालों की सस्ती कीमतें वह भारी तोपखाना है जिससे वह तमाम चीनी दीवारों को गिरा देता है तथा विदेशियों के लिए बर्बर जातियों की गहन हठी नफरत को झुकने के लिए मज़बूर करता है। वह सभी राष्ट्रों को, उन्मूलन के खतरे तले, उत्पादन की पूँजीवादी प्राणाली अपनाने पर मजबूर करता है;  यह उन्हें बाध्य करता है कि वे अपने मध्य वह स्थापित करें जिसे वह सभ्यता कहता है, यानि वे खुद पूँजीवादी बन जाएँ। एक शब्द में, वह स्वयं अपनी छवि मे एक दुनिया का निर्माण करता है..." (वही)

लेकिन उस समय ही, मार्क्स और एंगेल्स इन आवधिक संकटों को एक अंतहीन आवर्त, जो सदा खुशहाली को रास्ता देता है, से अधिक मानते थे। उन्होने इनमे पूँजीवाद को खोखला करते गहन अंतरविरोधों की अभिव्यक्ति देखी। "नए बाजारों की विजय" करके, पूँजीपति वर्ग "अधिक व्यापक और अधिक विनाशकारी संकटों की राह खोलता है, और साथ ही उन साधनों को जिनसे संकटों को रोका जा सकता है खत्म करता जाता है" (वही)। या : "जैसे जैसे उत्पादों की तादाद और फलस्वरूप विस्तारित बाजारों की जरूरत बढ़ती जाती है, विश्व बाजार अधिकाधिक सिकुडता जाता हैं; दोहन के लिए उपलब्ध नए बाजार कमतर होते जाते हैं,  चूँकि प्रत्येक पूर्ववर्ती संकट अभी तक अविजित अथवा सतही तौर पर दोहन किये बाजारों को विश्व व्यापार के अधीन करता है।" (उज़रती श्रम और पूँजी)

लेकिन हमारा ग्रह एक छोटी गोल गेंद है। 20वीं सदी के आरंभ तक सभी भूमि जीत ली गई थी और पूँजीवाद के महान ऐतिहासिक राष्ट्रों ने दुनिया आपस में बांट ली थी। तब से,  सवाल नई खोजें करने का नहीं है, बल्कि है प्रतिस्पर्धी देशों के प्रभुत्व वाले इलाकों पर सशस्त्र बल द्वारा अधिकार करने का। अब अफ्रीका, एशिया या अमेरिका के लिए कोई दौड नहीं है, बल्कि है अपने प्रभाव क्षेत्रों को बचाने तथा अपने साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्वियों के प्रभाव क्षेत्रों को सैन्य बल से हथियाने के लिए एक निर्मम युद्ध। यह पूँजीवादी देशों के अस्तित्व के लिए एक असली मुद्दा है।

तो यह संयोग नहीं था कि जर्मनी ने,  जिसके पास बहुत कम उपनिवेश थे और जो ब्रिटिश साम्राज्य की भूमियों में व्यापार के लिए उसकी शुभेच्छा पर निर्भर था (एक निर्भरता जो वैश्विक महत्वाकांक्षा रखने वाले किसी भी राष्ट्रीय पूँजीपति वर्ग के लिए अस्वीकार्य है), 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध शुरू किया। जर्मनी  "निर्यात करो या मरो" की आवश्यकता के कारण सबसे आक्रामक नजर आता है,  यह बाद में द्वितीय विश्व युद्ध की ओर हिटलर के गमन में स्पष्ट दिखाई देता है। इस बिंदु से, पूँजीवाद, विस्तार की चार सदियों के बाद एक पतनशील व्यवस्था बन गया। दो विश्वयुद्धों और 1930 के दशक की महामन्दी की विभीषिका इसका नाटकीय व अखंडनीय सबूत हैं।

तो भी, 1950 के दशक तक विधमान अतिरिक्त पूँजीवादी बाजारों के खत्म हो जाने के बाद भी पूँजीवाद अभी तक अति-उत्पादन के जानलेवा संकट में नहीं धंसा है। सौ से अधिक साल की धीमी मौत के बाद, यह व्यवस्था अभी भी खड़ी है, लड़खड़ाती हुई, रोगी अवस्था में, पर फिर भी खड़ी है। यह जीवित कैसे है?  क्यों यह जीव अति-उत्पादन के विष से अभी तक पूरी तरह लकवाग्रस्त नहीं? यही वह जगह है जहाँ से ऋण के आश्रय  की भूमिका शुरू होती है। ऋण का अधिकाधिक भारी मात्रा में उपयोग करके विश्व अर्थव्यवस्था भीषण ढहन से बच पाई है। इस प्रकार इसने एक कृत्रिम बाजार पैदा किया है। पिछले चालीस वर्षों का सार मंदियों और ऋण की खुराकों द्वारा वित्तपोषित उभारों की एक श्रृंखला के रूप में निकाला जा सकता है। और यह सिर्फ सरकारी खर्चों के माध्यम से परिवारों की खपत के समर्थन के रूप में नहीं। नहीं, राष्ट्रीय सरकारें भी कर्ज़दार हैं ताकि वे कृत्रिम तरीके से दूसरे  राष्ट्रों के साथ अपनी अर्थव्यवस्थाओं की प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रख सकें  (बुनियादी संरचनात्मक निवेशों में सीधे पैसा लगा कर, बैंकों को निम्नतम संभव दरों पर उधार देकर ताकि वे आगे व्यवसायों और परिवारों को उधार दे सकें ...)। ऋण के फाटक पूरे खोल दिये जाने पर पैसा स्वतंत्र रूप से बह निकला और धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्र अति-ऋणग्रस्तता की एक क्लासिक स्थिति  में आ पहुँचे : हर दिन अधिकाधिक नए ऋण जारी करना जरूरी था ... कल के ऋण चुकता करने के लिए। यह रास्ता अनिवार्यता एक अन्धीगली में ले पहुँचा। विश्व पूँजीवाद आज इसी अन्धीगली मे फंसा हुआ है : "ऋण की दीवार" के रूबरू।

पूँजीवाद के लिए 'कर्ज संकट'  का अर्थ - एक मरणासन्न के लिए अफ़ीम की ओवरडोज़

सादृश्य के लिए, पूँजीवाद के लिए ऋण ऐसे ही है जैसे एक घातक बीमारी में अफ़ीम। इसका सहारा लेकर संकट अस्थायी रूप से टल जाता है, पीड़ित शांत हो जाता है। लेकिन धीरे-धीरे दैनिक खुराकों पर निर्भरता बढ़ जाती है। जो उत्पाद शुरू में उद्धारकर्ता था, हानिकारक होने लगता है .. ओवरडोज़ की सीमा तक! विश्व ऋण पूँजीवाद के ऐतिहासिक पतन का एक लक्षण है। 1960 के दशक से विश्व अर्थव्यवस्था जीवन रक्षक ऋण के सहारे जिन्दा रही है, लेकिन अब कर्ज़े पूरे शरीर पर फैल गए हैं, वे व्यवस्था के निम्नतर अंग, निम्नतर सेल को पाटे हुए हैं। अधिक से अधिक बैंक, व्यवसाय, नगर पालिकाएँ, और राज्य दिवालिया हैं और दिवालिया होते जाएँगे जो अपने कर्जों का भुगतान करने में असमर्थ हैं।  

2007 की गर्मियों ने पूँजीवादी पतनशीलता, जो 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के साथ शुरू होती है, के इतिहास में एक नया अध्याय खोला। अधिकाधिक बड़े पैमाने पर कर्ज का सहारा लेकर संकट के विकास को धीमा करने की पूँजीपति वर्ग की क्षमता समाप्त हो गई। अब, झटके एक के बाद एक, बीच में बिना किसी राहत के और बिना किसी असल उभार के, आएँगे। पूँजीपति वर्ग इस संकट का कोई वास्तविक और स्थायी हल नहीं खोज पायेगा, इसलिए नही कि वह अचानक अक्षम बन जाएगा बल्कि इसलिए कि यह एक समस्या है जिसका कोई समाधान नहीं है। पूँजीवाद के संकट को पूँजीवाद हल नहीं कर सकता।

जैसे, हमने अभी अभी दिखाने की कोशिश की है, समस्या है पूँजीवाद, समूची पूँजीवादी व्यवस्था। और आज यह व्यवस्था दिवालिया हो चुकी है।

पावेल, 26 नवंबर 2011, वर्ल्ड रेवोल्युश्न 350, दिसंबर 2011 - जनवरी 2012