पूँजीवाद का जनवादीकरण करें या उसका विनाश?

सेन्ट पॉल के अधिग्रहण[1] स्थित टैन्ट सिटी यूनिवर्सिटी की दीवारों पर लिखे ''पूंजीवाद का जनवादीकरण करो'' के नारे ने ऐसी तीखी बहस छेडी कि अंततोगत्वा बैनरों को ही वहां से हटाना पडा।

यह परिणाम दिखाता है कि सेन्ट पॉल, यूबीएस तथा अन्यत्र अधिग्रहणों ने उन तमाम लोगों को, जो वर्तमान व्यवस्था से असन्तुस्ट हैं और एक विकल्प की खोज में हैं, चर्चा के लिये एक लाभदायिक स्थान मुहैया कराया है। 'पूंजीवाद का जनवादीकरण' कोई वास्तविक विकल्प नहीं है। पर यह उन तमाम लोगों के विचारों को अभिव्यक्त करता है जो अधिग्रहणों में तथा उन द्वारा जनित मीटिगों में भाग ले रहे हैं। बार-बार यह विचार पेश किया जाता है कि पूंजीवाद अधिक मानवीय बनाया जा सकता है बशर्ते धनवानों को अधिक टैक्स देने को मज़बूर किया जा सके, बशर्ते बैंकरों के बोनस खत्म कर दिये जाएँ, बशर्ते वित्तीय बाजार अधिक नियंत्रित हों अथवा अगर राज्य अर्थव्यवस्था के संचालन में अधिक सीधी दखलन्दाजी करे।

शीर्ष राजनेता तक ऐसा ही सुर अलापने लगे है। कैमरून पूंजीवाद को अधिक नैतिक बनाना चाहता है, क्लेग चाहता है कि सारी दुनिया जॉन लैविस जैसी हो और मज़दूरों के पास अधिक शेयर हों, मिलीबैन्ड ''परभक्षी'' पूंजीवाद के खिलाफ है और अधिक राजकीय नियन्त्रण का हिमायती है।

किन्तु पूंजीवाद के राजनेताओं की ओर से कही जाने वाली ये सब बातें थोथी लफ्फाजी हैं, एक धुएँ की चादर है जो हमे यह जानने से रोकने के लिए तानी गई है कि पूंजीवाद क्या है और क्या नहीं।

पूंजीवाद को व्यक्तियों द्वारा सम्पत्ति के मालिकाने के बराबर नहीं रखा जा सकता। बात सिर्फ बैंकरों की अथवा अन्य धनी कुलीनों की नहीं जो बहुत थोडी मेहनत का बहुत अधिक प्रतिफल पाते हैं। 

पूंजीवाद मानव सभ्यता के इतिहास में एक सम्पूर्ण चरण है। यह अल्पमत द्वारा बहुमत के शोषण पर आधारित समाजों की श्रांखला में से अंतिम है। यह पहला मानव समाज है जिसमें संपूर्ण उत्पादन बाजार में मुनाफा बटोरने के प्रति अभिप्रेरित होता है। अतएव यह प्रथम वर्ग-विभाजित समाज है जिसमें सभी शोषितों को कार्य की अपनी क्षमता, अपनी ‘श्रम शक्ति’ शोषकों के हाथों बेचनी पडती है। इस लिये जबकि सामन्तवाद में भूदासों को ताकत के बल पर सीधे-सीधे अपना श्रम तथा अपना उत्पाद मालिकों के हाथों सोंपने के लिये मजबूर किया जाता था, पूंजीवाद में, हमारा श्रम-काल बडे गूढ तरीके से उज़रती व्यवस्था द्वारा छीना जाता है।

इस लिये, इससे कोई फर्क नहीं पडता कि शोषक निजी मालिकों के रूप में अथवा चीन एवं उत्तरी कोरिया की तरह 'कम्युनिस्ट पार्टी’ के अहलकारों के रूप में संगठित हैं। जब तक उजरती श्रम है, तब तक पूंजीवाद का अस्तित्व है। जैसा मार्क्स ने कहा : “पूंजी उजरती श्रम को मान कर चलती है, उजरती श्रम पूंजी को मान कर चलता है''  ( उजरती श्रम और पूंजी )।

अपने केन्द्र में पूंजीवाद उजरती श्रमिकों (जिसमें बेरोज़गार भी शामिल हैं चूँकि बेरोजगारी उसी वर्ग की एक स्थिति है) तथा शोषक वर्ग के बीच एक सम्बन्ध है। पूंजी, मजदूरों द्वारा पैदा की गयी और उसी से छीन ली गयी सम्पत्ति है। पूंजी  मज़दूरों द्वारा निर्मित परकीयकृत संपत्ति है – एक ताकत जिसे उन्होंने निर्मित किया है पर जो एक कठोर शत्रु के रूप में उनके मुकाबले खडी है।

संकटग्रस्त पूंजीवाद

पर पूंजीपति वर्ग व्यवस्था से जबकि फायदा उठाता है, वह उसे नियंत्रित नहीं कर सकता। पूंजी एक अवैयक्तिक ताकत है जो अंततः उनके काबू से बाहर है और उन पर भी राज करती है। इसी बजह से पूंजीवाद का इतिहास आर्थिक संकटों का इतिहास है। पूंजीवाद वीसवीं सदी के आरंभ के आस पास से जब से विश्व व्यवस्था बना है, यह संकट कमोवेशी स्थायी हो गया है फिर चाहे वह विश्वयुद्ध का रूप ले चाहे विश्व मन्दियों का।

शासक वर्ग और उसका राज्य चाहे कोई भी आर्थिक नीतियां अजमाये - कीन्सवाद, स्तालिनवाद अथवा राज्य समर्थित ''नव उदारवाद'' - यह संकट गहराता तथा असाध्य  बनता गया है। अपनी अर्थव्यवस्था में गतिरोध से हताशा का शिकार, सत्ताधारी वर्ग के विभिन्न धडे तथा विभिन्न राष्ट्रीय राज्य जिनमे वे संग़ठित हैं, वे सब निष्ठुर प्रतिस्पर्धा, सैनिक टकराव तथा पर्यावरणीय विनाश् की कुण्ड्ली_ में फंसे हुए हैं। मुनाफे की तथा रणनीतिक श्रेष्ठता की खोज उन्हें कम से कमतर नैतिक तथा अधिक से अधिकतर ‘परभक्षी’ बनने की ओर धकेल रही है।

पूंजीपति वर्ग एक डूबते जहाज का कप्तान है। उसे धरती के नियन्त्रण से च्युत करने की जरूरत कभी इतनी गहन नहीं रही।

किन्तु,  इन्सान के अलगाव की चरम विन्दु इस व्यवस्था ने एक नये एवं सच्चे मानव समाज के निर्माण की संभावना को भी पैदा किया है। इसने विज्ञानों और तकनीकों को गतिमान किया है जिन्हें रूपान्तरित कर सभी के लाभ के लिये प्रयोग किया जा सकता है। अतएव, इसने संभव बनाया है कि उत्पादन को मुद्रा अथवा बाजार की मध्यस्थता के बिना ही सीधे-सीधे उपभोग की ओर मोडा जा सके। इसने दुनियां को एक सूत्र में पिरो दिया है अथवा कम से कम उसकी वास्तविक एकता के लियें आधार तैयार कर दिये हैं। इसलिये, इसने राष्ट्रीय राज्यों और उनके अनवरत युद्धों की संपूर्ण व्यवस्था के विनाश को संभव बनाया है। सक्षेप में, इसने एक विश्व मानव समुदाय के पुराने सपने को आवश्यक एवं संभव बना दिया है। हम इस समाज को साम्यवाद कहते हैं।

शोषित वर्ग का, उजरती श्रम के वर्ग का अपनी विरोधी व्यवस्था के भ्रमों का शिकार होने में कोई हित नहीं है। यह वर्ग वर्तमान समाज की कब्र खोदने और नये का निर्माण करने की संभावना रखता है। लेकिन इस संभावना को चरितार्थ करने के लिये उसके लिए यह सुसपष्ट होना लाजिमी है कि वह किसके खिलाफ और किसके लिये लड रहा है। पूंजीवाद को सुधारने और उसका जनवादीकरण करने संबंधी तमाम विचार इस सपष्टता के मार्ग में अनेक वाधायें हैं।

पूंजीवाद और जनतंत्र

पूंजीवाद को और अधिक मानवीय बनाने के समान ही आजकल हर कोई जनतंत्र की वकालत करता है और चाहता है कि समाज और अधिक जनवादी बने। और इसी लिये हम जनतंत्र के विचार को मात्र इसके अंकित मूल्य के आधार पर नहीं ले सकते, एक ऐसे अमूर्त विचार के रूप में नहीं ले सकते जिस पर सब सहमत हैं। पूंजीवाद के समान जनतंत्र का भी अपना एक इतिहास है। एक राजनैतिक व्यवस्था के रूप में, प्राचीन एथेंस में जनतंत्र दासता तथा स्त्रियों के बहिष्कार के साथ-साथ जीवित रह सकता था। पूंजीवाद में, संसदीय जनतंत्र एक ऐसे अल्पमत के सत्ता पर एकाधिकार के साथ अस्तित्व में रह सकता है जिसने ना सिर्फ आर्थिक सम्पदा पर बल्कि लोगों की सोच (और मताधिकार) को प्रभावित करने वाले वैचारिक यंत्रों को भी हथिया लिया है।

पूंजीवादी जनतंत्र पूंजीवादी समाज का एक आयना है जो हम सब् को बाजार में प्रतिस्पर्धा करती अलग-थलग पडी इकाइयों में परिवर्तित कर देता है। सिद्धांत में, हम सब् समान आधार पर प्रतिस्पर्धा करते हैं पर असलियत यह है कि सम्पदा कम से कमतर लोगों के हाथों में सिमटती जाती है। जब हम वैयक्तिक नागरिकों के रूप में मतदान केन्द्र में प्रवेश करते हैं तो हम उतने ही अकेले होते हैं जितने असल ताकत के प्रयोग से दूर।

ट्यूनीशिया और मिस्र से स्पेन, ग्रीस तथा अमेरिका तक विभिन्न अधिग्रहणों तथा जन सभी आन्दोलनों में चल रही बहसों मे दो धडों मे कमोबेशी निरन्तर टकराव दिखाई पडता है। एक ओर वे लोग हैं जो वर्तमान व्यवस्था को और अधिक जनवादी बनाने से आगे नहीं जाना चाहते, जो मुबारक जैसे तानाशहों से छुटकारा पाने तथा संसदीय व्यवस्था लागू करने के लक्ष्य पर रूक जाना चाहते है, अथवा स्थापित राजनैतिक दलों पर दवाब डालना चाहते हैं ताकि वे सडक पर आम जन की मांगें की ओर अधिक ध्यान दें। और दूसरी ओर हैं वे, जो अभी बेशक एक अल्पमत हैं, जिन्होंने कहना शुरू किया है : अगर हम सवंय को सीधे सामान्य सभाओं में संगठित कर सकते हैं तो हमे संसद की क्या जरूरत है? क्या संसदीय चुनाव कोई परिवर्तन ला सकते हैं? क्या हम अपने जीवन का नियन्त्रण अपने हाथ में लेने के लिए सामान्य सभाओं जैसी संस्थाओं का प्रयोग नहीं कर सकते – न सिर्फ सार्वजनिक स्थलों पर किन्तु खेतों, कारखानों तथा कार्यशालओं में भी? 

ये बहसें नयी नहीं हैं। ये प्रथम विश्वयुद्ध के पशचात रूसी और जर्मन क्रान्तियों के काल में हुई बहसों को प्रतिध्वनित करती हैं। करोडों लोग उस पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ लामबन्द थे जिसने युद्ध के मोरचों पर लाखों का संहार करके पहले ही यह साबित कर दिया था कि वह  अब मानवजाति के लिए कोई सार्थक रोल अदा करने के लायक नहीं रही। जबकि कुछ लोग  थे जिनका कहना था कि क्रान्ति को ''पूंजीवादी जनतांत्रिक” व्यवस्था की स्थापना से आगे नहीं जाना चाहिये, कुछ ऐसे भी थे, और उस वक्त उनकी संख्या काफी बडी थी, जिन्होंने कहा कि संसद सत्ताधारी वर्ग का हथियार है। हमने अपनी एसेंम्बलियों, फैक्टरी कमेटियों तथा सोवियतों (सामान्य सभाओं पर आधारित संगठन जिसमें प्रतिनिधियों को चुनने तथा वापस बुलाने का अधिकार था) का निर्माण कर लिया है। इन संगठनों को सत्ता संभाल लेनी चाहिए और फिर यह हमारे अपने हाथ में रह सकती है : समाज को                                                                                                                                               ऊपर से नीचे तक पुर्नगठित करने की ओर प्रथम कदम के रूप में। और अलगाव, गृहयुद्ध तथा  आंतरिक पतन द्वारा क्रान्ति के विनाश् से पहले, थोडे समय के लिये सोवियतों ने, मजदूर वर्ग के इन निकायों ने, रूस में राज्य सत्ता पर दखल किया था।

वह मानवजाति के लिये अभूतपूर्व आशा का वक्त था। यह तथ्य कि वह प्रयास पराजित रहा हमें भयभीत नही कर सकता : हमें अपनी हारों और विगत की भूलों से सबक लेना होगा। हम पूंजीवाद का जनवादीकरण नहीं कर सकते क्योंकि यह पहले से कहीं अधिक राक्षसी तथा विनाशक ताकत है जो, अगर हमने इसे घ्वस्त नहीं किया तो, समूची दुनिया का विनाश कर देगी। और सवंय पूंजीवादी संस्थाओं का प्रयोग करके हम इस दानव से छुटकारा नहीं पा सकते। हमें नये संगठनों की आवश्यकता है, ऐसे संगठन जिन्हें हम कंट्रोल कर सकें तथा उस क्रातिकारी परिवर्तन की ओर निदेशित कर सकें जो हमारी एकमात्र वास्तविक उम्मीद है।

अमोस, 25 जनवरी 2012, वर्ल्ड रेवोल्युश्न 351, फरवरी-2012

 

1. यहां ‘अधिग्रहण’ से आश्य उस ‘अक्युपाई वाल स्ट्रीट’ आंदोलन से है जो 2011 में अमेरिका से शुरू हो कर यूरोप के अन्य देशों में भी फैल गया था।