पूँजी के हमलों के खिलाफ, मजदूर संघर्ष गठित करो

पूँजी के हमलों के खिलाफ, उसके दलालों के खिलाफ। मजदूर संघर्ष गठित करो।

मजदूर साथियों!

शोषितों की जिन्दगियों पर पिल्‍ल पड़ा है पूँजीवाद!

भारतीय पूँजीवाद को बरसों से सता रहे संकट, उसकी आंतों में बरसों से पक रहे नासूर आखिर फूट निकले हैं। उसकी दिवालिया अर्थव्‍यवस्‍था खुलेआम ढ़ह रही है। मजदूरों तथा शोषितों के जीवन हालातों पर बरसों से चलाई जा रही छुरी की जगह अब मालिक-शासक वर्ग के भयंकर चौतरफे हमलों ने ले ली है। दशकों से गरीबी तथा मोहताजी की चक्‍की में पिसती शोषित मजदूर आबादी के लिए जीवन की जरूरतों के लिए तरस जाने के हालात पैदा हो गए है। जीवन की मूलभूत जरुरतों को खरीद पाना उनके लिए असंभव होता जा रहा है।

झूठ तथा  मक्‍कारियों के उस्‍ताद हमारे शासक मंहगाई का प्रतिशत 12 प्रतिशत बताते हैं। खुद मालिकों संघ इसका 15 प्रतिशत से पार जाने की बात मानते है। यह पहले ही इसके ऊपर है तथा और ऊपर चढ़ रही है। पर महंगाई की मार का असल पैमाना आंकडे नहीं, वह है शोषितों-मजदूरों में भविष्‍य को लेकर पैदा हो रहा डर तथा चिन्‍ता। जीवन की स्थितियां तेजी से गन्‍दी तथा असहनीय बनती जा रही है। ऊपर भागती कीमतें मजदूरों-मेहनतकशों की तनख्‍वाहें चुराने का साधन हैं।

अशंकाओं से घिरे मजदूर वर्ग के बड़े हिस्‍सों की रोजियां मिटाकर उन्‍हें अंधेरी खाई की ओर धकेला जा रहा है। मेटल बाक्‍स, फीनीक्‍स, यूनीवर्सल इलेक्‍ट्रीकल्‍स, थामसन प्रेस, केल्‍वीनेटर, एचसीएल, बजाज आटो, बिन्‍नी तथा कैलको मिल्‍स, सीटीसी, स्‍कूटर्स इण्डिया, आटो ट्रेक्‍टर्स, यूपी सीमेन्‍ट – इन कारखानों के कुल मजदूरों में से 40 हजार से अधिक की रोजी या तो छीन ली गई है या छीनी जानेवाली है। सरकारी तथा प्रायवेट क्षेत्र में लाखों और रोजियां मिटाने को 24 जुलाई को कानूनी दरजा दिया जाना था। संसद अब 10/12 दिन बाद इसे कानून बनाएगी। शासक वर्ग बदमाशी से इसे ‘बर्हिगमन’ (बाहर जाना) कहता है।

शासक वर्ग के ये हमले हमारी मुसीबतों का अन्‍त नहीं है। वे तो आरंभ हैं। लाईलाज संकटों में फंसे सरकारी, गैर सरकारी पूँजीवाद ने लोक भलाई का नकाब उतार फेंका है। पूरी खूंखारता से वह शोषितों की जिन्दगियों पर पिल्‍ल पड़ा है। उसके हमलों की क्रूरता में तेजी ही आएगी।

यूनियनों द्वारा बन्‍द वर्ग संघर्ष का रास्‍ता

मजदूरों तथा शोषितों की एकजुट जुझारु लड़ाईयां ही मालिक-शासक वर्ग के बेलगाम हमलों को नकेल डाल सकती हैं। पर चिन्‍ता तथा असंतोष से भरे मजदूर अपने तथा मालिकों के बीच शासक वर्ग के यूनियनी दलालों को खड़ा पाते है। वे संघर्ष के अपने रास्‍तों को बन्‍द किया पाते है और पाते हैं कि संघर्ष के उनके मादे को कमजोर तथा सन्‍न किया जा रहा है। यह करना ही यूनियनों तथा वामपंथियों का रोल है।

मेटल बाक्‍स, यूनीवर्सल इलेक्‍ट्रीकल्‍स, फीनीक्‍स, यूपी सीमेन्‍ट के मजदूरों को जब चुपचाप मालिकों-शासकों की मार तथा दमन का शिकार बनवाया जाता है, सड़कों पर धकेल दिए गए तथा गुस्‍से से भरे थामसन प्रेस, केल्‍वीनेटर के मजदूरों को जब अलग थलग हाथ पर हाथ धरे, घर पर या गेट पर बैठाया जाता है तो उनको थकान की, निराशा की, हार की तथा मालिकों का कुछ न बिगाड़ सकने की गहरी भावना से भरा जाता है। मजदूर वर्ग के व्‍यापक हिस्‍सों में फैल कर यह भावना उनकी लड़ाईयों को बरसों पीछे धकेलती है। यह करना और इस प्रकार पूँजीवाद की सुरक्षा करना, यही तो रोल है वामपंथियों तथा उनके यूनियनी दलालों का।

शासक वर्ग की मौजूदा चौतरफी चढ़ाई के खिलाफ ‘व्‍यापक आन्‍दोलन’ छेडने की वाम‍पंथियों की, उनके यूनियनी छुटभैयों की बातें महज एक प्रपंच, मजदूर असंतोष को उनके नियंत्रण के बाहर जाने से रोकने की एक साजिश हैं। मजदूर वर्ग के खिलाफ संसद में पास किये जा रहे वे सब कानून जिनके खिलाफ आन्‍दोलन छेडने का वे फ्राड रच रहे हैं, उन सब कानूनों पर इन वामपंथियों के दस्‍तखत है। इनके कन्‍धे के बिना केन्‍द्रीय सरकार एक दिन भी न टिक पाती।

जरा इनकी बदमाशी तो देखिए। पीलीभीत में पुलिस द्वारा दस धनी सिखों के कतल पर ये बहुत गुस्‍सा हैं; पर दो जून को इनके दोस्‍त मुलायम सिंह यादव द्वारा मारे डाला सीमेन्‍ट फैक्‍ट्री के चालीस मजदूरों के कतल पर न सिर्फ इन्‍हें गुस्‍सा नहीं आया बल्कि मालिक वर्ग के बाकी गुटों के साथ मिलकर इन्‍होंने यकीनी बनाया कि यह बात मजदूर वर्ग के व्‍यापक हिस्‍सों में फैलने न पाए।

मजदूर संघर्ष ही शासक वर्ग और उसके दल्‍लों का मुंह तोड सकते हैं

मजदूरों, साथियों, मालिक वर्ग के, उसके दलालों के मंसूबों की कामयाबी हमारे जीवनों पर दु:ख दर्द, बदहाली तथा अभावों की बिजली ही गिराएगी। उनके इन मंसूबों का हमें मुँहतोड जवाब देना है। उसके लिए जरूरी है कि हम अपने आप को पूँजी के दल्‍लों के चंगुल से मुक्‍त कर लें। सोचें, समझें और यह जान लें कि पूँजी के दलालों से मुक्‍त, एकजुट तथा जुझारु संघर्ष ही मालिकों के हमलों का मुँह तोड़ सकता है। संघर्ष समितियां तथा एक्‍शन ग्रुप बनाकर, अपनी लड़ाईयों को अपने काबू में रखकर, उन्‍हें अपनी आम सभाओं द्वारा चलाकर ही हम मालिक वर्ग के दिल में मजदूर वर्ग की शक्ति का डर भर सकते हैं। मजदूर वर्ग की सचेत एकजुट तथा संघर्षरत शक्ति ही मालिक वर्ग के हमलों को रोक सकती है, केवल वह ही पूँजीवाद, जिसका हर रुप, हर रंग, हर ढ़ाँचा बिमार है, को मिटाकर मजदूर वर्ग की मुक्ति का द्वार खोल सकती है।

दिवालिया पूँजीवाद के लिए बलि का बकरा बनने से मना कर दो। एकजुट हो जाओ, लड़ो। पूँजीवाद का विनाश कर दो।

कम्‍युनिस्‍ट इंटरनेशनलिस्‍ट,  अगस्त 1991, संपर्क – पोस्‍ट बाक्‍स नं: 25, एनआईटी, फरीदाबाद, हरियाणा