में

1. जर्मन कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (स्‍पार्टकसबुन्‍द) का गठन

जब 30 दिसम्‍बर 1918 और 1 जनवरी 1919 के बीच जर्मन कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की स्‍थापना की गई तो लगा जैसे सामाजिक जनवाद के प्रति क्रांतिकारी विरोध ने अभिव्‍यक्‍त पा ली हो। लेकिन जर्मन पार्टी (जो ठीक उस क्षण प्रकट हुई जब सर्वहारा गलियों में हथियारबन्‍द संघर्ष में लिप्‍त था और, अल्‍प-अवधि के लिए, वास्‍तव में कुछ औद्योगिक केन्‍द्रों में सत्‍ता पर कब्‍जा कर रहा था) ने तुरन्‍त ही अपने उदगम के बेमेल चरित्र को तथा उन कार्यभारों, जिन्‍हें  पूरा करने के लिए उसकी रचना की गई थी, की एक सार्वभौमिक और सम्‍पूर्ण समझ हासिल करने की अपनी असमर्थता को प्रकट किया।

वे कौन सी ताकतें थी जो पार्टी के गठन के लिए इक्‍कठा हुईं थी? और वे समस्‍याएं क्‍या थी जो तुरन्‍त ही इन ताकतों के रास्‍ते में रुकावट बन कर सामने आई?

हम यहाँ इनमें से सबसे  रोचक तथ्‍यों का परीक्षण करेंगे क्‍योंकि वे पार्टी की गलतियों को समझने में हमारी मदद करेंगे और क्‍योंकि वे आगामी विकास को काफी प्रभावित करनेवाले थे।

4 अगस्‍त 1914 के बाद की घटनाओं का प्रक्षेप पथ अपने में बहुत सी कठिनाईयों और भ्रमों को समेटे था। स्‍पार्टकस ग्रुप का इतिहास इसका स्‍पष्‍ट प्रमाण है। सैद्धांतिक स्‍पष्‍टीकरण और विकास पर एक ब्रेक की इसकी भूमिका बहुत साफ है।

स्‍पार्टकस लीग (स्‍पार्टकसबुंद) के समय के सभी महत्‍वपूर्ण निर्णय रोजा लुग्‍जमबर्ग की पोजीशनों को अभिलक्षित करते थी। (ग्रुप ने स्‍पार्टकस लीग नाम 1916 में अपना; 1915 में ग्रुप को इसके रिव्‍यू, जो पहले-पहल अप्रैल 1915 में निकला, के नाम पर इंटरनेशनेल कहा जाता था।)

जिम्‍मरवाल्‍ड (5-7 सितम्‍बर 1915) में जर्मनों का प्रतिनिधित्‍व किया इंटरनेशनेल ग्रुप ने, बर्लिन से बोरकारट ने जो रिव्‍यू रोशनी की किरणें से जुडे छोटे से ग्रुप का प्रतिनिधित्‍व करता था और काउत्‍सकी से जुड़े मध्‍यमार्गी धडे ने। केवल बोरकारट ने लेनिन की अन्‍तर्राष्‍ट्रीयवादी पोजीशनों का समर्थन किया जबकि अन्‍य जर्मनों ने निम्‍न शब्‍दों में अंकित प्रस्‍ताव का समर्थन किया:

‘‘किसी भी स्थिति में यह संकेत नहीं दिया जाना चाहिए कि यह सम्‍मेलन फूट को उभाड़ना और एक नये इंटरनेशनल की स्‍थापना करना चाहता है।’’

किन्‍थाल में (24-30 अप्रैल 1916) जर्मन विरोध पक्ष का प्रतिनिधित्‍व किया इंटरनेशनेल ग्रुप (बर्था थालीमिर और अर्नस्‍ट मेयर) ने, संगठन में विरोध पक्ष ने (हाफमैन के गिर्द के मध्‍यमार्गी) और पाल फरोलिच के जरिये ब्रीमेन लिंकसरेडिकलेन ने।

स्‍पार्टकसवादियों (इंटरनेशनेल) की हिचकिचाहटों पर तुरन्‍त ही पार नहीं पाया गया। एक बार फिर वे वाम (लेनिन-फरोलिच) की अपेक्षा मध्‍यमार्गीयों की पोजीशनों के अधिक निकट थे। ई मेयर ने कहा : ‘‘नये इंटरनेशनल का हम वैचारिक आधार तैयार करना चाहते है, लेकिन हम संगठनात्‍मक स्‍तर पर अपने-आप को इससे बाँधना नहीं चाहते, क्‍योंकि प्रत्‍येक चीज अभी बदलाव की स्थिति में है।’’

यह लुग्‍जमबर्ग की क्‍लासिकीय पोजीशन थी जिसके लिए पार्टी क्रांति की आरंभिक तैयारी की अवस्‍था की अपेक्षा इसके अन्‍त में ज्‍यादा जरूरी थी। (‘‘एक शब्‍द में, ऐतिहासिक तौर पर, वह क्षण जब हमें नेतृत्‍व संभालना होगा क्रांति के शुरू में नहीं बल्कि इसके अन्‍त में है।’’)

अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सबसे महत्‍वपूर्ण कारक था ब्रीमेर लिंकसरेडिलेन[1] का उदय। 1910 से ही ब्रीमेन का सामाजिक जनवादी पत्र ब्रीमेर बरएर्जीट पान्‍नेकोएक और रादेक के साप्‍ताहिक लेख प्रकाशित कर रहा था और डच वाम के असर तले ही ब्रीमेन ग्रुप ने स्वयं को नीफ, पाल फरोलिच और दूसरों के गिर्द गठित किया। 1915 के अन्‍त में आईएसडी (जर्मनी के अन्‍तर्राष्‍ट्रीय समाजवादी) का गठन हुआ, इसका जन्‍म बर्लिन क्रांतिकारियों, जो रोशनी की किरणें नामक रिव्‍यू निकालते थे, और ब्रीमेन कम्‍युनिस्‍टों के मेल से हुआ। ब्रीमरलिंक औपचारिक तौर पर दिसम्‍बर 1916 में सामाजिक जनवाद से स्‍वतंत्र हो गया लेकिन उसी साल जून में उसने पहले ही अर्वीटरपालीटिक[2] का प्रकाशन आरंभ कर दिया था जो कि वाम का सबसे महत्‍वपूर्ण बैध पत्र था। पान्‍नेकोएक और रादेक के लेखों के अलावा इसमें जिनोवीव, बुखारिन, कामनेव, ट्राटस्‍की और लेनिन की रचनायें प्रकाशित होती रहती थी। अर्वीटरपालिटिक ने तुरन्‍त सुधारवाद से अलगाव की एक अधिक परिपक्‍व चेतना दिखाई। अपने पहले अंक में उन्‍होंने लिखा कि 4 अगस्‍त ‘‘उस राजनीतिक आन्‍दोलन का स्‍वाभाविक अन्‍त था जिसके पतन की प्रक्रिया कुछ समय से जारी थी।’’

अर्वीटरपालिटिक से ही वे प्रवृत्तियां उभरीं जो पार्टी का सवाल उठाने में नेतृत्‍वकारी रोल अदा करने वाली थीं। सामाजिक जनवाद के भीतर बने रहने के स्‍पार्टकसवादियों के हठ के कारण उनमें तथा ब्रीमेन ग्रुप में  बहस मुश्किल थी।

एक जनवरी 1916 को इंटरनेशनेल ग्रुप के राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में नीफ ने सामाजिक जनवादी पार्टी से पूर्ण अलगाव तथा मूलतया एक नए आधार पर क्रांतिकारी पार्टी के गठन की मांग के किसी स्‍पष्‍ट परिदश्‍य की अनुपस्थिति की आलोचना की।

इस वक्त स्‍पार्टकसवादी ग्रुप इंटरनेशनेल रीशसटैग में सामाजिक जनवादी कार्य समूह (सोश्ल डेमोक्रेटिक वर्क क्लेक्टिव) का पक्षधर था तथा ऐसी घोषणाऐं कर रहा था:

‘‘पार्टी के लिए संघर्ष लेकिन पार्टी के खिलाफ नहीं......पार्टी में जनवाद के लिए, आम कार्यकर्ताओं के अधिकारों के लिए, अपने कर्तव्‍य भूल चुके नेताओं के खिलाफ पार्टी के साथियों के लिए संघर्ष। हमारा नारा है न तो अलगाव न एकता, न तो नई पार्टी न पुरानी, बल्कि आम सदस्‍यों के विद्रोह द्वारा आधार स्‍तर पर पार्टी पर पुनर्विजय....। पार्टी के लिए निर्णायक संघर्ष शुरू हो चुका है। (स्‍पार्टकस ब्रीफ, 30 मार्च 1916)

उसी समय अर्वीटरपालीटिक में पढृा जा सकता था :

‘‘हम समझते है कि इंटरनेशनल के वास्‍तविक पुन: निर्माण तथा सर्वहारा आन्‍दोंलन के पुन:जागरण के लिए राष्‍ट्रीय तथा अन्‍तर्राष्‍ट्रीय, दोनों स्‍तर पर फूट न केवल अवश्‍यंभावी है बल्कि एक अनिवार्य पूर्वशर्त है। हम मानते हैं कि मेहनतकश जनता के सम्‍मुख इस गंभीर विश्वास को अभिव्‍यक्‍त करने से झिझकना अस्‍वीकार्य तथा खतरनाक है।’’ (नं : 4)

और लेनिन ने जूनियस पैंफलेट पर (जुलाई 1916) में लिखा :

‘‘जर्मन क्रांतिकारी मार्क्‍सवाद की सबसे बड़ी कमजोरी है मजबूती से बुने एक अवैध संगठन का अभाव.... ऐसा संगठन अवसरवादों, जैसा काउत्‍सकी का है, के प्रति अपने रवैये को स्‍पष्‍टत: परिभाषित करने को बाध्‍य होगा। केवल जर्मनी के अन्‍तर्राष्‍ट्रीय समाजवादियों (आई एस डी) ने ही इस प्रश्‍न पर एक स्‍पष्‍ट सुलझी हुई पोजीशन अभिव्‍यक्‍त की है।’’   

स्‍पार्टकसवादियों  ने हास, लेडेवर, काउत्‍सकी, हिलफर्डिंग तथा बर्नस्टीन की पार्टी, यूएसपीडी, का भी अनुसरण करना जारी रखा (जर्मन की स्‍वतंत्र सामाजिक जनवादी  पार्टी का गठन 6-8 अप्रैल 1917 को हुआ था; यह एक मध्‍यमार्गी पार्टी थी और अपने आकार के सिवाए सामाजिक जनवाद से सारतत्‍व में भिन्‍न नहीं थी लेकिन यह जनता के बढ़ते लड़ाकूपन से जुड़ी हुई थी)। इस अनुसरण ने ब्रीमेन कम्‍युनिस्‍टों और स्‍पार्टकसवादियों के बीच सम्‍बन्‍धों को और भी मुश्किल बना दिया। मार्च 1917 में अर्वीटरपालीटिक‍ में अभी भी पढ़ा जा सकता था:

‘‘वाम अमूलवादी (लेफ्ट रेडिकल्स) एक महत्वपूर्ण निर्णय के सम्‍मुख हैं। सबसे बड़ी जिम्‍मेदारी इंटरनेशनेल ग्रुप की है, अपनी आलोचना के बावजूद जिसे हम भावी अमूलवादी पार्टी का केन्‍द्र बनने वाला सबसे सक्रिय और बड़ा ग्रुप मानते हैं। हम बिना किसी लाग-लपेट के कहेंगे कि उनके बिना हम, हम खुद तथा आई एस डी, निकट भविष्‍य में एक कार्य सक्षम पार्टी का निर्माण करने में असमर्थ होंगे। यह इंटरनेशनेल ग्रुप पर निर्भर करता है कि वाम अमूलवादियों का संघर्ष एक झण्‍डे तले व्‍यवस्थित ढंग से चलाया जाएगा या मजदूर आन्‍दोलन के भीतर के विरोधपक्ष जो अतीत में प्रकट हुए हैं और जिनकी होड़ स्‍पष्‍टीकरण में एक कारक है, वे अपना बहुत-सा समय और शक्ति बरबाद कर देंगे और उनका अंत  भ्रमों में होगा।’’ (शब्‍दों पर जोर हमारा)

स्‍पार्टकस ग्रुप के यूएसपीडी से चिपके रहने की स्थिति बाबत उसी पत्र ने कहा –

इंटरनेशनेल ग्रुप मर गया है,,,, कुछ साथियों के एक समूह ने एक नई पार्टी की रचना के लिए खुद को एक एक्‍शन कमेटी के रूप में गठित किया है।’’

वास्‍तव में, एक नई पार्टी का आधार स्‍थापित करने के उदेश्‍य को लेकर, अगस्‍त 1917 में ब्रीमेन, बर्लिन फेंकफुर्त, और दूसरे जर्मन नगरों से डेलीगेटों की एक मीटिंग बर्लिन में हुई। ड्रेसडेन ग्रुप के साथ आटों रुहले ने इस मीटि़ग में भाग लिया।

खुद स्‍पार्टकस ग्रुप में बहुत से ऐसे तत्‍व थे जिनकी पोजीशनें लिंकसरेडीकलेन के बहुत करीब थीं और जिन्‍हें रोजा लुग्‍जमबर्ग के गिर्द ‘‘जेनटरेल’’ का संगठनात्‍मक समझौता स्‍वीकार्य नहीं था। पहले-पहल यह सामाजिक जनवादी कार्य समूह में भाग लेने के विरोध में डुइसबर्ग, फेंकफुर्ट और ड्रेसडेन के स्‍पार्टकस ग्रुपों के में प्रकट हुआ। (ड़़ुइसबर्ग ग्रुप का मुख्‍पत्र कैम्‍फ, इस भागीदारी के खिलाफ एक प्रबल बहस में लिप्‍त था)। तदन्‍तर दूसरे ग्रुपों ने यूएसपीडी से जुडे रहने का विरोध किया, मसलन हैकर्ट के गिर्द महत्‍वपूर्ण ग्रुप चेमनित्‍ज। व्‍यवहार में ये ग्रुप अर्वीटरपालीटिक में रादेक द्वारा अभिव्‍यक्‍त पोजीशन का समर्थन करते थे:

‘‘मध्‍यमार्गियों के साथ पार्टी बनाने का विचार एक खतरनाक यूटोपिया है। यदि वे अपने ऐतिहासिक कार्यों को अंजाम देना चा‍हते हैं तो वाम अमूलवादियों को अपनी पार्टी बनानी होगी, चाहे हालतों ने उन्‍हें इसके लिए तैयार किया हो या नहीं।’’

खुद लीब्‍कनेख्‍त, जो वर्ग के भीतरी उभार से ज्‍यादा करीब से जुड़ा हुआ था, ने जेल में लिखी एक रचना (1917) में अपनी पोजीशन को अभिव्‍यक्‍त किया जिसमें, क्रांति की जीवित धड़कन को पकड़ने का प्रयास करते हुए, उसने जर्मन सामाजिक जनवाद के भीतर की तीन सामाजिक परतों में भेद किया। पहली परत वैतनिक अधिकारियों की थी जो सामाजिक जनवादी पार्टी के बहुमत की राजनीति का सामाजिक आधार थी। दूसरी परत में थे :

‘‘अच्‍छे खाते-पीते और शिक्षित मजदूर। उनके लिए शासक वर्ग के साथ एक गंभीर झड़प की आसन्‍नता स्‍पष्‍ट नहीं ह। वे प्रत्‍याघात करना तथा संघर्ष करना चाहते हैं। वे सामाजिक जनवादी कार्य समूहों का आधार है।’’

अन्‍त में, तीसरी परत में थे :

सर्वहारा जनसमूह, अशिक्षित मजदूर। शब्‍द के स्‍टीक अर्थ में सर्वहारा। केवल इस पर्त के पास, इसकी वास्‍तविक स्थ्‍िति के कारण, खोने को कुछ नहीं है। हम इन जनसमूहों का, सर्वहारा का, समर्थन करते हैं।’’

इस सबसे दो बातों का पता लगता है :

  1. कि स्‍पार्टकस ग्रुप के एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍से का झुकाव उसी दिशा में था जिसमें कि वाम अमूलवादियों का, और यह उस अल्‍पमत केन्‍द्र, जिसका प्रतिनिधित्‍व रोजा लुग्‍जमबर्ग, जोगीसश्चेस और पाल लेवी करते थे, के साथ टकराव में आ रहा था।
  2. स्‍पार्टकस ग्रुप का संघात्‍मक, गैर-केंद्रीकृत चरित्र।

रूसी क्रांति

इस क्रां‍ति बाबत स्‍पार्टकसवादियों तथा यूएसपीडी के बहुमत के बीच उठे मतभेद अर्वीटरपालीटिक को एक बार फिर स्‍पार्टकसवादियों के साथ बातचीत की ओर ले गए।[3] ब्रीमेन कम्‍युनिस्‍टों ने रूसी क्रांति से एकजुटता को कभी जर्मनी में कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के गठन की जरूरत से अलग नहीं किया। ब्रीमेन कम्‍युनिस्‍टों ने पूछा, रूस में क्रांति क्‍यों विजयी हुई थी ?

‘‘सिर्फ और सिर्फ इस लिए क्‍योंकि रूस में वाम असूलवादियों की अपनी एक स्‍वायत पार्टी है जिसने शुरू से ही समाजवाद की पताका को उठाया है और सामाजिक क्रांति के झण्‍डें तले लड़ी है।’’

‘‘यदि गोथा में शुभेच्‍छा से कोई इंटरनेशनेल ग्रुप के दृष्टिकोण के पक्ष में अभी भी तर्क खोज सकता था तो आज स्‍वतंत्रों के साथ मेल की उचितता के आभास तक खत्‍म हो चुके हैं।’’

‘‘आज अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्थिति एक अमूलवादी (रेडिकल) पार्टी की स्‍थापना को और भी अधिक महत्‍वपूर्ण जरूरत बनाती है।’’

‘‘अपनी तरफ से हम जर्मनी में एक लिकसरेडीकलेन पार्टी के लिए परिस्थितियॉं तैयार करने में अपनी पूरी ताकत लगाने को दृढ़ता से वचनबद्ध है। इसलिए पिछले नौ महीनों से स्‍वतंत्रो की कमजोरी को ध्‍यान में रखते हुए तथा गोथा समझौतों (जो जर्मनी में अमूलवादी आन्‍दोलन के भविष्‍य को केवल नुकसान ही पहुँचा सकता है)[4] के क्षयकारी प्रतिघातों को ध्‍यान में रखते हुए, हम इंटरनेशनेल ग्रुप के अपने साथियों को नकली-समाजवादी स्‍वतंत्रो से स्‍पष्‍ट तथा खुले तौर पर अलग होने तथा एक स्‍वायत अमूलवादी वाम पार्टी की स्‍थापना करने को निमन्त्रित करते हैं।’’ (अर्वीटरपालीटिक 15 दिसम्‍बर, 1917)

इस सब के बावजूद जर्मनी में पार्टी की स्‍थापना तक एक साल और गुजरने बाला था, और एक ऐसा साल जिसमें सामाजिक तनाव धीरे-धीरे बढ़ रहे थे: बर्लिन की 17 अप्रैल की हड़तालों से गर्मियों के नेवी विद्रोह और जनवरी 1918 की हड़तालों की लहर (बर्लिन, रुहर कील ब्रीमेन, हम्‍बर्ग ड्रेसडन), जो पूरी गर्मियों और पतझड में जारी रही।

आईये, अब हम जर्मन स्थ्‍िाति का अभिलक्षण कुछ दूसरे छोटे ग्रुपों की जांच-पड़ताल करें। हमने ऊपर जिक्र किया है कि आईएसडी ने बर्लिन के रोशनी की किरणें रिव्‍यू के गिर्द ग्रुप को भी अपने साथ जोड़ लिया था। उस ग्रुप का सबसे महत्‍वपूर्ण प्रतिनिधि बोरकारट था। उसने रिव्‍यू में जो विचार विकसित किये थे वे उग्रतापूर्वक सामाजिक जनवाद विरोधी थे, लेकिन अपनी अर्ध-अराजकतावादी प्रवृत्ति के कारण वे पहले ही ब्रीमेन कम्‍युनिस्‍टों से सम्‍बन्‍ध- विच्छेद को दिखाते थे। जैसा अर्वीटर-पालीटिक ने कहा: ‘‘पार्टी के स्‍थान पर, वह (बोरकार्ट) एक अराजक प्रवृत्ति के प्रचारात्‍मक पंथ को रखता है।’’ आगे चलकर, वाम कम्‍युनिस्‍टों ने उसे गद्दार माना और उसका नाम ‘‘भगौडा जूलियन’’ रखा।

बर्लिन में, बरनर मोलर, जो पहले ही रोशनी की किरणों में भागीदार था, अर्वीटरपालीटिक का एक उत्‍कट सहकर्मी और बाद में उसका प्रतिनिधि बना। (जनवरी 1919 में नोसके के आदमियों ने निर्दयतापूर्वक उसका हत्या कर दिया गया)।

बर्लिन में वामधारा बहुत प्रबल थी, दूसरों के अतिरिक्‍त, स्‍पार्टकसवादी कार्ल शरोडर और फ्रेडरिक वेन्‍डल (बाद में केएपीडी वाले) उसमें थे।  

सामाजिक जनवाद के प्रति क्रांतिकारी विरोधपक्ष में हैम्‍बर्ग ग्रुप का अपना विशेष स्‍थान है। यह नवंबर 1918 में ही अईएसडी में शामिल हो हुआ जब उसने नीफ के प्रस्‍ताव पर 23 दिसंबर 1918 को अपना नाम आईकेजी (जर्मनी के अन्‍तरर्राष्‍ट्रीय कम्‍युनिस्‍ट) कर लिया। हैम्‍बर्ग में अगुआ हाइनरिख लाफेनबर्ग तथा फ्रित्ज़ बोल्‍फेम थे। ब्रीमेन कम्‍युनिस्‍टों से जो चीज उन्‍हें अलग करती थी, वह थी नेताओं के खिलाफ निर्देशित एक संघाधिपत्‍यवादी (सिंडीकेलिस्ट) तथा अराजकी ढंग की तीखी बहस। दूसरी तरफ अर्वीटरपालीटिक ने सही पोजीशन प्रतिपादित की जब उसने लिखा :

‘‘वाम अमूलवादियों का ध्येय, जर्मनी की भावी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी का ध्येय, जिसमें देर-सबेर वे सभी शामिल होंगे जो पुराने आदर्शों के प्रति वफादार बने रहे हैं, बड़े नामों पर टिका हुआ नहीं। इसके विपरीत यदि हमें कभी समाजवाद हासिल करना है तो वास्‍तव में नया जो तथ्‍य है और जो होना चाहिए वह यह कि बेनाम जनसमूह अपना भाग्‍य स्‍वयं अपने हाथ में ले लें, प्रत्‍येक साथी अपने आसपास के बड़़े नामों के बारे में खुद को चिन्तित किये बगैर अपना व्‍यक्तिगत योगदान दे।’’ (जोर हमारा)

हैम्‍बर्ग ग्रुप के राजनीतिक दिशाविन्‍यास का खुला संघाधिपत्‍यवादी (सिंडीकेलिस्ट) चरित्र एक हद तक वोल्‍फोम की तबकि गतिविधि से उत्‍पन्‍न हुआ जब वह अमेरिका में इंटरनेशनल वर्करस आफ द वर्ल्‍ड से सम्‍बद्ध था।

लेकिन निस्‍संदेह, इस वक्‍त जर्मनी में वर्ग संघर्ष की सबसे बढिया अभिव्‍यक्ति ब्रीमेन कम्‍युनिस्‍टों में पाई जाती थी। यह कहना संगठन की समस्‍या पर्, क्रांतिकारी प्रक्रिया की अवधारणा पर तथा पार्टी की भूमिका पर स्‍पार्टकस ग्रुप (और उसकी बेहतरीन सिद्धांतकार रोजा लुग्‍जमबर्ग) के सभी तर्क और गलतियॉं उजागर कर देता है। तो भी रोजा लुग्‍जमबर्ग की गलतियों की ओर इशारा किसी भी प्रकार से उसके वीरोचित संघर्ष की अस्‍वीकृति को सूचित नहीं करता; बल्कि यह समझने की इजाजत देता है कि बर्नस्‍तीन तथा काउत्‍सकी के खिलाफ अपनी सैद्धांतिक लड़ाई में विकसित विस्‍तृत अन्‍तदृष्टि के साथ-साथ उसने ऐसी पोजीशनों का भी बचाव किया जिन्‍हें हम स्‍वीकार नहीं कर सकते।

हमारे पास पूजने के लिए कोई देवता नहीं है; इसके विपरीत हमें अतीत की भूलों को समझने की जरुरत है ताकि हम खुद उनसे बच सकें, ताकि हम यह जान सकें कि ऐतिहासिक सर्वहारा आन्‍दोलन से उपयोगी किन्‍तु अपूर्ण सबक (इस मामले में क्रांतिकारियों के कार्य तथा संगठनात्‍मक कार्यभारों संबंधी) कैसे निकाले जाएँ।

अपने कार्यभार पूरा करने के लिए हमें उस अटूट संबंध को समझना होगा जो प्रतिक्रांति के दौर में छोटे क्रांतिकारी ग्रुपों की गतिविधि (और बिलान तथा इंटरनेशनलिज्‍म का काम इसका मुंह बोलता गवाह है) के बीच तथा राजनैतिक ग्रुप की उस कार्रवाई के बीच में विद्यमान है जो वह तब करता है पूँजी के असाध्‍य अन्‍तर्विरोधों वर्ग को क्रांतिकारी संघर्ष की और धकेल रहे होते हैं। सवाल अब पोजीशनों के मात्र बचाव का नहीं रहता। बल्कि सवाल है इन पोजीशनों के सतत विशदीकरण तथा वर्ग के कार्यभारों के आधार पर वर्ग की स्‍वयंस्‍फूर्तता को मज़बूत करने के समर्थ होने का। सवाल है वर्ग की चेतना की एक अभिव्‍यक्ति होने का, निर्णायक आक्रमण के लिए उसकी ताकतों को एकजुट करने में सहायक होने का, दूसरे शब्‍दों में पार्टी के निर्माण का, जो सर्वहारा की विजय में आवश्‍यक चरण है।

लेकिन क्रांतियों की ही तरह पार्टियों भी तैयार-बर-तैयार आसमान से नहीं टपकती। इसकी थोड़ी व्‍याख्‍या करें। संगठनात्‍मक कृत्रिमतायें मात्र किसी पुराने ध्‍येय की सेवा नहीं करतीं, इसके विपरीत उन्‍होंने बहुधा प्रतिक्रांति की सेवा की है। ‘‘पार्टी’’ की घोषणा करना, प्रतिक्रांति के दौर में अपने संगठन को पार्टी के रूप में खडा करना एक विसंगति, एक बहुत गंभीर गलती है जो फौरी क्रांतिकारी परिदृश्‍य की गैरहाजिरी में समस्‍या के सारतत्‍व को समझने की असमर्थता दिखाती है। लेकिन इस कार्य को ताक पर रख देना अथवा वक्‍त गुजरने तक इसको टालते जाना भी किसी कदर कम गंभीर गलती नहीं मौजूदा अध्‍ययन के संदर्भ में यह दूसरी गलती अधिक महत्वपूर्ण है।

जो लोग कहते हैं कि समस्‍त समस्‍याएँ स्‍वयं-स्‍फूर्त सुलझ जाएँगी वे, अंतिम विशलेषण में, अचेत स्‍वतस्‍फूर्तता का गुणगान कर रहे हैं न कि स्‍वतस्‍फूर्तता से चेतना की ओर गमन का; वे या तो यह समझने में असमर्थ है या समझना नहीं चाहते कि वर्ग द्वारा अपने संघर्ष में चेतना की प्राप्ति उसे पूँजी के गढ़, राज्‍य, पर आक्रमण के लिए समुचित औज़ार की जरूरत को पहचानने की ओर ले जाएगी।

अगर वर्ग की स्‍वत: सक्रियता एक चरण है जिसकी हम वकालत करते है तो स्‍वत: स्‍फूर्ततावाद, यानि स्‍वत: सक्रियता को एक उसूल करार देना, वास्‍तव में स्‍वत: सक्रियता को खत्‍म कर देता है। यह स्वंय  को कई एक बासी जड़सूत्रों में व्‍यक्‍त करता है : ‘‘जहाँ मजदूर हैं वहां होने’’ का उत्तेजित प्रयास, यह फैसला लेने की अयोग्‍यता कि उतार और आवर्तन के क्षणों में कब ‘‘धारा के खिलाफ’’ होना है ताकि बाद में निर्णायक क्षणों में ‘‘धारा के साथ’’ चला जा सके। संगठन के सवालों पर लुग्‍जमबर्ग के भटकावों ने स्वंय को सत्ता जीतने की उसकी अवधारणा में भी प्रकट किया – और यहां हम यह जोड़ेंगे कि इन दोनों सवालों में घनिष्‍ठ अन्‍तर सम्‍बन्‍ध होने के नाते यह अनिवार्य था :

‘‘हमारे लिए सत्ता की जीत एक झटके में अंजाम नहीं दी जाएगी। यह एक क्रमिक कार्रवाई होगी, क्‍योंकि हम पूँजीवादी राज्‍य की समस्‍त पोजीशनों पर उत्तरोत्तर कबजा करेंगे, जीते हुए की जी-जान से रक्षा करते हुए।’’ (‘जर्मन कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की स्‍थापना कांग्रेस में रोज़ा लुग्जमबर्ग का भाषण’, पाथफाईंडर प्रेस)।

बदकिस्‍मती से, बात यहीं खत्‍म नहीं हुई। ब्रीमेन ग्रुप का प्रतिनिधित्‍व करते हुए, पॉल फ्रोलिच जब नवंबर 1918 में हैम्‍बर्ग में निम्‍न अपील जारी कर रहा था -- ‘‘यह जर्मन क्रॉंति की, विश्‍व क्रांति की शुरुआत है। विश्‍व क्रान्ति की महानतम कार्रवाई, जिन्‍दाबाद! जर्मन मजदूर गणराज्य जिन्‍दाबाद! विश्‍व बोल्‍शेविज्‍म जिन्‍दाबाद!’’ बजाए यह पूछने के कि इतना बड़ा हमला क्‍यों पराजित हुआ, करीब एक माह बाद रोजा लुग्‍जबर्ग कह रही थी ‘‘नवम्‍बर 9 को मजदूरों और सिपाहियों ने जर्मनी में पुराने शासन को उखाड़ फेंका.... नवम्‍बर 9 को सर्वहारा उठ खड़ा हुआ और उसने यह शर्मनाक जुआ उतार फेंका...। जर्मन राजशाही को कौंसिलों में संगठित मजदूरों और सिपाहियों ने मार भगाया।’ इस प्रकार सत्‍ता के विलियम द्वितीय के गिरोह के हाथ से एबर्ट-शीदेमान-हास के गिरोह के हाथ में जाने की व्याख्या उसने एक क्रान्ति के रूप में की ना कि क्रांति के खिलाफ पुराने पहरेदारों की तबदीली के रूप में। [5]

सामाजिक जनवाद की ऐतिहासिक भूमिका को समझने की इस असफलता की कीमत रोजा लुग्‍जमबर्ग, लीब्‍कनेख्‍त तथा हजारों सर्वहारागणों को अपनी जान से चुकानी पड़ी। केऐपीडी (जर्मन कम्‍युनिस्‍ट मजदूर पार्टी), इतालवी वाम के समान, इस तजरूबे से सबक लेने के मामले में स्‍पष्‍ट थी। केऐपीडी द्वारा कम्‍युनिस्‍ट इंटरनेशनल के तथा केपीडी के विरोध का एक अत्‍याधिक बुनियादी कारण था यूएसपीडी से किसी भी प्रकार का सम्‍बन्‍ध रखने से उसका सख्त विरोध। इस ओर हम बाद में लौटेंगे। फिलहाल, 6 फरवरी 1921 को बोरदिगा ने एल कम्‍युनिस्‍टा में ‘‘सामाजिक जनवाद का ऐतिहासिक कार्य’’ नामक एक लेख लिखा। इसमे से हम चन्‍द अंश दे रहे हैं:

‘‘सामाजिक जनवाद का एक ऐतिहासिक कार्य है, इस अर्थ में कि यूरोप में संभवत: एक ऐसा दौर रहेगा जब सामाजिक जनवादी पार्टियाँ, स्वंय अथवा बुर्जुआ पार्टियों के सहयोग में सत्‍ता में रहेंगी। सर्वहारा के पास यद्यपि इसे रोकने की क्षमता न हो, ऐसी मध्‍यवर्ती मंजिल क्रान्तिकारी रूपों और संस्‍थाओं के विकास में एक सकारात्‍मक तथा आवश्‍यक अवस्‍था नहीं; उनके लिए उपयोगी तैयारी होने के विपरीत यह सर्वहारा क्रान्तिकारी आक्रमण को कम करने, उसे विपथ करने की बुर्जुआजी की हताश कोशिश होगी, ताकि बाद में मजदूरों को, अगर सामाजिक जनवाद की वैधानिक, मानवतावादी तथा सभ्‍य सरकार के खिलाफ बगावत करने की ताकत अभी उनमे बाकी हो, सफेद प्रतिक्रिया के झण्‍डों तले निर्ममता से कत्‍ल किया जा सके।’’

‘‘जिस प्रकार मजदूर कौंसिलों की तानाशाही के सिवा सर्वहारा सत्‍ता का कोई अन्‍य रूप नहीं हो सकता, उसी प्रकार हमारे लिए बुर्जुआजी से सर्वहारा को सत्‍ता हस्‍तांतरण के सिवा कोई सत्‍ता हस्‍तांतरण नहीं हो सकता।’’

2. जर्मन कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (स्‍पार्टकस बुँद) के लड़खड़ाते कदम

हमने यह अध्‍ययन जर्मन कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की 30 दिसंबर 1918 – 1 जनवरी 1919 की स्‍थापना कांग्रेस से शुरू किया। फिर हम इसकी जडों की ओर मुड गए। अब हम आरंभिक प्रस्थान-बिन्दू से जारी रखेंगे।

स्‍थापना कांग्रेस में दो बिल्कुल विरोधी दो पोज़ीशनें उभर कर सामने आईं। एक ओर था रोजा लुग्‍जमबर्ग, जोगिश्चे तथा पाल लेबी के गिर्द का अल्‍पमत जिसमें पार्टी की सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण शख़्सियतें शामिल थीं और जिसने, अल्‍पमत में होने के बावजूद, उसका नेतृत्‍व संभाला। (अल्‍पमत का खिल्ली उडाने का  रवैया तथा वाम की प्रबल पोजीशनों को अभिव्‍यक्ति की करीब-करीब इजाजत न देना, जेनट्रेल में सिर्फ फ्रालिच को शामिल किया गया था, कुछ माह बाद हाईडलवर्ग कांग्रेस में तमाशा बनने वाला था।) दूसरी तरफ था पार्टी का बहुमत : आईकेडी तथा स्‍पार्टकसवादियों के एक बड़े हिस्‍से द्वारा व्‍यक्‍त उत्‍साह तथा क्रान्तिकारी अर्न्‍तशक्ति। लीब्‍कनेख्‍त के नेतृत्‍व में वाम की पोजीशनें भारी बहुमत से विजयी हुई; चुनावों का विरोध, यूनियनों का त्‍याग, आम बगावत की तैयारी।

लेकिन बगावती आक्रमण की तैयारी के फौरी कार्यभारों के समक्ष बहुमत के पास एक स्‍पष्‍ट परिदृश्‍य की कमी थी। सैनिक समस्‍या भी पार्टी के केन्‍द्रीकृत तथा नेतृत्‍वकारी रोल की मांग करती थी। चारों ओर एक प्रकार का संघवाद तथा स्‍थानीयतावादी स्‍वतंत्रता हावी थी। बर्लिन में शायद ही किसी को पता था कि रूहर में, देश के मध्‍य में अथवा दक्षिण में क्‍या घट रहा है और् इसके उल्‍टे भी। स्‍वयं रोटफाहन ने 8 जनवरी 1919 में माना कि ‘‘मजदूर वर्ग को संगठित करने के कार्यभार के लिए जिम्‍मेदार एक केन्‍द्र का अनास्तित्‍व बना नहीं रह सकता....। यह अत्याधिक जरूरी है कि क्रांतिकारी मजदूर जनसमूहों की लड़ाकू शक्ति को दिशा देने तथा उसका क्रान्तिकरण करने में समर्थ एक संगठन-तन्‍त्र की स्‍थापना करें।’’ और यह रिपोर्ट मात्र बर्लिन की बात कर रही है।

यह विघटन और बढ़ने वाला था। रोजा लुग्‍जमबर्ग तथा लीब्‍कनेख्‍त की हत्या के बाद यह पागलपन के स्‍तर तक पहुँच गया। ऐन उस वक्‍त जब पार्टी भूमिगत होने को मजबूर थी और प्रतिक्रांतिकारी हिंसा का शिकार थी, उसने अपने-आप को सिर (नेतृत्‍व) विहीन पाया। जर्मनी में सब जगह, ब्रीमेन, म्‍युनिख, बावेरिया आदि में उभरने वाले सोवियत गणराज्‍यों को एक-एक कर पराजित कर दिया गया और सर्वहारा योद्धाओं को कत्‍ल किया गया। सर्वहारा उभार, वर्ग में निहित अपरिमित संभावनाओं को एक धक्‍का लगा। हम अप्रैल 1919 में बावेरियन सोवियत गणराज को लिखे लेनिन के पत्र को पूरा उद्धृत करने से नहीं रह सकते। कहने की जरूरत नहीं कि लेनिन द्वारा सुझाए अधिकतर ‘‘ठोस कदम’’ कभी उठाए नहीं जा सके।

बावेरियन सोवियत गण्‍राज्‍य को शुभकामनाएँ

‘‘हम शुभकामना सन्‍देश के लिए आप को धन्‍यवाद देते हैं और बावेरियन सोवियत गणराज का जी-जान से स्‍वागत करते हैं। हम चाहेंगे के आप शीघ्र हमें उन कदमों के बारे में अधिक ठोस रूप से तथा अधिक बार सूचना दें जो आपने बुर्जुआ जल्‍लादों के, शीदेमान और कम्‍पनी के खिलाफ संघर्षों में उठाए हैं; क्‍या आपने शहर के विभिन्न भागों में मजदूरों तथा नौकरों की सोवियतें बनाई हैं, क्‍या आपने सर्वहारा की हथियारबन्‍द और बुर्जुआजी को निरस्‍त्र किया है, क्‍या आपने मजदूरों और सर्वोपरि खेत मजदूरों तथा छोटे किसानों की मदद के लिए कपड़े तथा अन्‍य वस्‍तुओं के गोदामों का भरपूर उपयोग किया है, क्‍या आपने म्‍युनिख के पूंजीपतियों के कारखानों का, उनके माल का तथा पास-पड़ोस के पूंजीवादी कृषि उद्यमों का अधिग्रहण किया है, क्‍या आपने छोटे किसानों के रहननामों तथा लगानों का उन्‍मूलन किया है, क्‍या आपने खेत मजदूरों तथा अन्‍य मजदूरों की मजदूरी को तिगुना किया है, क्‍या आपने जनता के लिए परचे तथा अखबार छापने के मकसद से समस्‍त कागज तथा छापेखानों का अधिग्रहण किया है, क्‍या आपने राजकीय प्रशासन कला के अध्‍ययन को अर्पित दो घण्‍टों सहित छ: घण्‍टों का कार्य दिवस लागू किया है, क्‍या आपने मजदूरों को फौरन धनी मकानों में ठहराने के लिए पूंजीपतियों को एक जगह इकटठा किया है, क्‍या आपने समस्‍त बैकों का अधिग्रहण किया है, क्‍या आपने बुर्जुआजी में से बन्दी बनाए हैं, क्‍या तुमने मजदूरों को बुर्जुआजी के सदस्‍यों से अधिक देता खाद्यान का राशन लागू किया है, क्‍या आपने पड़ोसी गांवों में प्रचार तथा प्रतिरक्षा के लिए फौरन समस्‍त मजदूरों को लामबन्‍द किया है। मजदूरों तथा खेत मजदूरों की सोवियतें, तथा अलग से, छोटे किसानों की सोवियतों द्वारा लागू इन कदमों तथा ऐसे ही अन्‍य कदमों का विशालतम संभव उपयोग आपकी पोजीशन को अवश्‍य मजबूत बनाएगा। एक असाधारण टैक्‍स से बुर्जुआजी पर चोट करना तथा फौरन, हर कीमत पर, मजदूरों, खेत मजदूरों तथा छोटे किसानों की स्थिति में व्‍यवहारत: सुधार करना अति आवश्‍यक है। शुभकामनाएँ तथा सफलता की आशा’’- लेनिन।

सैद्धांतिक तैयारी की यह कमी, हालात की जरूरत के बराबर उठ पाने की यह असमर्थता, उतार के पहले चिन्‍हों के साथ फूट को जन्‍म देने वाली थी। दूसरी ओर वे थे जिन्‍होंने विजयी रूसी क्रान्ति के रणनीतिक तथा कार्यनीतिक तरीकों को जर्मनी पर लागू करने की हास्यस्पद कोशिश में अब बोलशेविज्‍म की ओर, विजयी रूसी क्रांति की ओर देखना और उसके प्रचार को उठाना शुरू किया। रादेक का मामला इसका ठेठ उदाहरण है। आरंभ में वह आन्‍दोलन के सर्वाधिक अटल खेमे, ब्रीमेन कम्‍युनिस्‍टों, का प्रवक्‍ता था। 1919 की गर्मियों में संघर्ष के उतार के बाद वह पाल लेवी के साथ, अक्‍तूबर 1919 की हाईडलबर्ग कांग्रेस का निर्माता बना जहां पार्टी की स्‍थापना कांग्रेस की उपलब्धियों को तिलांजलि दे दी गई और उन्‍हें बदल दिया गया चुनावों के कार्यनीतिक उपयोग द्वारा, अति-सुधारवादी यूनियनों में काम द्वारा और अन्त में ‘‘खुले-पत्रों’’ के तथा ‘‘संयुक्‍त मार्चों’’ के प्रयोग द्वारा।

इस प्रकार, इस रुझान द्वारा केन्‍द्रीयकरण का आहवान संदिग्‍ध उपयोगिता लिए हुए है, क्‍योंकि वे आन्‍दोलन के स्‍वत:स्‍फूर्त विकास की दिशा के उल्‍ट रास्‍ता अपना रहे थे।  दूसरी ओर क्रांतिकारी खेमे ने यह बनावटी चुनाव करने से इन्‍कार कर दिया और उसके पूर्वानुमान अधिक फलदायक साबित हो रहे थे। पर जब उन्होंने स्वंय को एक संगठित रुझान में गठित कर लिया तो उन्हें बढ़ती मुश्किलों की एक ठोस दीवार का सामना करना पडा।

क्‍या विश्‍व क्रांति रूसी क्रांति की खामियों की बजह से फेल हुई अथवा रूसी क्रांति विश्‍व क्रांति की खामियों की बजह से फेल हुई?

इस समस्‍या का उत्तर सरल काम नहीं और वह इन बरसों की सामाजिक गत्‍यात्‍मकता की समझ की मांग करता है। रूसी क्रांति पश्चिमी सर्वहारा के लिए एक शानदार उदाहरण थी। मार्च 1919 [6] में स्‍थापित तीसरा इंटरनेशनल बोल्‍शेविकों के क्रांतिकारी संकल्‍प का उदाहरण है और यूरोपीय कम्‍युनिस्‍टों का सहयोग हासिल करने की उनकी वास्‍तविक कोशिश का प्रतिनिधित्‍व करता है। लेकिन रूसी इंकलाब की अन्‍दरूनी मुश्किलें जो गृहयुद्ध के अन्‍त में आसमान छूने लगी थी और रूसी ढांचे में जिनका कोई समाधान नहीं था और जर्मन इंकलाब के पहले चरण (जनवरी-मार्च 1919) की तथा हंगरी के सोवियत गणराज्‍य की असफलता, इस सब ने रूसी कम्‍युनिस्‍टों को यकीन दिला दिया कि यूरोप में क्रांति एक चिरकालिक परिदृश्‍य है। उनके अनुसार अब मसला था भविष्य के लिए मजदूरों के बहुमत को पुन: अपनी ओर करना तथा सामाजिक जनवादी जनसमूहों को कम्‍युनिस्‍ट पोजीशनों के सहीपन के कायल करना। एक रुझान था यूएसपीडी को पुन: अपने में मिलाने का, उसे बुर्जुआजी के एक गुट की बजाए मजदूर आन्‍दोलन के दक्षिण-पंथ के रूप में देखने का। और सामाजिक जनवाद के खिलाफ संघर्ष को, वर्ग के सर्वाधिक अग्रगामी स्‍तरों के लड़ाकूपन के आधार पर सामाजिक जनवाद को नंगा करने और उस पर हमले की जरूरत पर जोर देकर इन स्‍तरों से जुड़ने के प्रयासों को धीरे धीरे त्याग दिय गया।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पहले दौर में (1918-1919) पश्चिमी कम्‍युनिस्टों की हिचकिचाहट जानलेवा थी। तो बाद में यूरूप में जब स्थिति अभी भी क्रांतिकारी थी, स्वंय कम्‍युनिस्‍ट इन्‍टरनेशनल  एक सच्‍चे सर्वहारा हिरावल के, पछेता ही सही, फलने-फूलने के रास्‍ते में रुकावट बनने वाला था। और हम यहां मात्र 1920-21 के सालों की बात कर रहे हैं। इसके बाद हम बुर्जआजी के हमलों के खिलाफ सर्वहारा प्रतिक्रिया के दो और सालों की बात कर सकते हैं, मसलन हैम्‍बर्ग 1923। सिर्फ उसके बाद ही मजदूर वर्ग की अन्तिम हार और उसके कत्‍लेआम की बात की जा सकती थी। एक स्थिति से दूसरी में गमन यद्यपि क्रमिक रूप से हुआ, फिर भी हम इस पतन के निर्णायक चरणों को अंकित कर सकते हैं : कम्‍युनिस्‍ट इन्‍टरनेशनल द्वारा एम्‍सटर्डम ब्‍यूरो को भंग किया जाना और लेनिन की रचना वामपंथी कम्‍युनिज्‍म एक बचकाना रोग।

आइये, जर्मन कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के उतार-चढ़ाव की ओर लौटें। 17 अगस्‍त 1919 को फ्रैंकफुर्त में एक राष्‍ट्रीय कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। वाम पर लेवी का आक्रमण असफल रहा। लेकिन उसी वर्ष अक्‍तूबर में इसे अधिक सफलता मिली। एक गुप्‍त कांग्रेस में जिसमें जिला सेक्‍शनों का बहुत कम प्रतिनिधित्‍व था, और बहुतों की इच्‍छाओं के खिलाफ, जनवरी में अपनाई कार्यक्रम संबंधी पोजीशनें बदल कर एक व्‍यवहारिक विभाजन का निर्णय लिया गया। पार्टी के नये कार्यक्रम का पॉइंट 5 इस प्रकार था:

‘‘क्रान्ति, जो एक झटके से नहीं होगी बल्कि एक वर्ग, जो सदियों से दलित है और इस प्रकार अपने ध्‍येय और अपनी ताकत के प्रति अभी पूर्ण रूप से सचेत नहीं, का लम्‍बा तथा दृढ़ प्रतिज्ञा संघर्ष होगी, और यह चढ़ाव तथा उतार की प्रक्रिया से शासित है।’’

और शीघ्र बाद लेवी ने इस दृष्टिकोण का समर्थन किया कि नई क्रांतिकारी लहर ....1926 में आएगी। पर ‘‘वामपंथियों’’, ‘‘दुस्‍साहवादियों’’ को निष्‍कासित करने का निर्णय आधिकारिक रूप से नहीं लिया गया था और यह सवाल 1920 में केपीडी की तीसरी काँग्रेस तक नहीं सुलझा था। हाईडलबर्ग काँग्रेस के बाद वाम ने स्वंय को केपीडी (ओ) (ओ का अर्थ विरोधपक्ष) में गठित करने का प्रयास किया। इस प्रकार व्‍यवहारिक रूप से यह सुनिश्चित हो गया कि 1920 के पहले चन्‍द महींनों के बाद करीब-करीब दो केपीडी संगठन थे: केपीडी (स्‍पार्टकसबुंद) तथा केपीडी (ओ)। यह सब एक पूर्णतया अराजक स्थिति में घटित हुआ। बिरले और अपूर्ण समाचार ही जैसे-तैसे मासको तक पहुँच पाते थे। 10 अक्‍तूबर 1919 के इतालवी, फ्रां‍सीसी तथा जर्मन कम्‍युनिस्‍टों के अभिनंदन में लेनिन ने लिखा:

‘‘जर्मन कम्‍युनिस्‍टों बाबत हम सिर्फ इतना जानते है कि अनेकों कस्‍बों में कम्‍युनिस्‍ट प्रैस है। एक आन्‍दोलन जो तेजी से फैल रहा है और जो जबरदस्‍त दमन का शिकार है, उसमें मतभेदों का उभरना अनिवार्य हैा यह बढ़्ने का दर्द है। जहां तक मैं आंक पाया हूँ, जर्मन कम्‍युनिस्‍टों के मतभेदों को कानूनी रास्‍तों का प्रयोग करने, बुर्जुआ संसदों, प्रतिक्रियावादी युनियनों, शीदेमानों तथा काउत्‍सकियों द्वारा दूषित कानूनी कौंसिलों को प्रयोग करने के मसले के रूप मे, इन संस्‍थाओं में हिस्‍सा लेने अथवा उनका बहिष्‍कार करने के मसले के रूप मे प्रस्‍तुत किया जा सकता।’’

लेनिन ने इन संस्‍थाओं में भागीदारी का पक्ष लिया और लेवी की नीतियों पर अपनी स्‍वीकृति की मोहर लगा दी।

लेनिन केन्‍द्रीय समस्‍या, जो चन्‍द माह बाद प्रकट होनेवाली थी, यह थी कि या तो गैर-कानूनी क्रान्तिकारी संघर्ष तथा सैनिक तैयारी को अपनाया जाए या फिर यूनियनों तथा संसद में कानूनी गतिविधियों को। केपीडी की ‘‘दो लाइनों’’ के बीच संघर्ष का यही आधार था। कुछ समय के लिए विरोधपक्ष का केन्‍द्र हैम्‍बर्ग में आधारित था। लेकिन लोफनबर्ग तथा वोल्‍फहोम की साख शीघ्र गिरने लगी। उन्‍होंने ही राष्‍ट्रीय बोल्‍शेविज्‍म का प्रतिपादन करना शुरू किया था, जिसके मुताबिक एटेण्‍ट के खिलाफ जर्मनी की प्रतिरक्षा, जर्मन बुर्जुआजी से गठजोड़ की कीमत पर भी, एक क्रान्तिकारी कर्तव्‍य थी।[7] तब से ब्रीमेन, जो पहले ही एक ‘‘सूचना केन्‍द्र’’ के रूप में काम कर रहा था, वामपंथी कम्‍युनिज्‍म के लिए संदर्भ बिन्‍दू बन गया। 1920 के आरम्‍भ तक ब्रीमेन सूचना केन्‍द्र ने दो मोरचों पर संघर्ष किया : पार्टी जैनट्रेल के खिलाफ तथा हैम्बर्ग के खिलाफ। ब्रीमेन ने विभाजन की कोशिश नहीं कि बल्कि हाईडलबर्ग कांग्रेस की नतीजों पर  बहस अयोजित करने का प्रयास किया। पर लेवी द्वारा समर्थित जैनट्रेल समस्‍त बहस के विरुद्ध था और इस काम में उसे हैम्‍बर्ग के राष्‍ट्रीय बोल्‍शेविज्‍म के खिलाफ संघर्ष से मदद मिली। प्रयासित कैप प्रतिक्रांति ने इन मतभेदों को ‘‘व्‍यवहारिक’’ अन्‍तर्य देकर समस्‍त बहसों का अन्‍त कर दिया।

आईए प्रतिक्रांति की इस कोशिश के प्रति सर्वहारा प्रतिक्रिया का और विभिन्‍न संगठनों के व्‍यवहार का निरिक्षण करें।

‘‘रुहर में रीशवेहर ने कैप के प्रति अपनी पोजीशन फौरन स्‍पष्‍ट नहीं की। ऐ.डी.जी.बी. (जर्मन यूनियनें)[8] तथा सामाजिक जनवाद से लेकर मध्‍यमार्गियों तथा के.पी.डी.(एस) तक सभी ने आम हड़ताल का आहवान् किया था (के.पी.डी. का मध्‍यमार्ग बेशक शुरू के दिनों में डुलमुल था)। इस सभ के चलते, अगर यूनियनों तथा संसदीय पार्टियों का नेतृत्‍व तोड़ा जा सकता तो स्थिति में क्रान्तिकारी संभावनाएँ होतीं। वास्‍तव में, बर्लिन, म्युनिश, ब्रीमेन, हैम्‍बर्ग आदि के विपरीत रुहर तथा केन्‍द्रीय जर्मनी जबरदस्‍त सर्वहारा हारों में से नहीं गुजरे थे।

‘‘रुहर में रीशवेहर तथा मजदूरों के बीच काफी तनाव था, और कैप प्रतिक्रांति द्वारा भड़की स्थिति ऐसी थी कि इसका परिणाम था फौरन हड़ताली मजदूरों को हथियारबन्‍द करना। (यह तथ्‍य भी अहम था कि बहुत से लड़ाकू मजदूर एफएयूडी (एस) में शामिल होकर ए.डी.जी.बी. के दबदबे से बच निकले थे।) आम हड़ताल के जनवादी, संविधानवादी चरित्र के चलते, स्‍वतंत्र तथा अन्‍य अनेक सामाजिक जनवादी पहले कुछ दिनों में मजदूरों की आक्रमकता को सिर्फ कम करने की कोशिश कर सके। यद्यपि संघर्ष के पहले शिखरबिन्‍दुओं के दौरान उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली। हालत इस प्रकार विकसित हुए : प्रत्‍येक कसबे में स्‍थानीय रूप से यूनियनों से स्‍वतंत्र ऐसी सर्वहारा इकाइयँ गठित की गई जिन्होंने रीशवेहर के सैनिकों के खिलाफ हथियार उठाए। बागी कसबों ने अपनी ताकत को एकजुट किया और अभी भी फौज के कब्‍जे वाले कसबों के खिलाफ चढ़ाई की ताकि स्‍था‍नीय मजदूरों की मदद की जा सके।

रुहर की ‘लाल सेना’ (इसे यही कहा जाता था) एक हिस्से ने रीशवेहर को रुहर से बाहर धकेल दिया तथा लिप के समान्‍तर एक मोर्चा बनाया। मज़दूरों की अन्‍य इकाईयों ने एक-एक करके रेमशीड, मुलहीम, डीसबर्ग, हैमबोर्न तथा डिन्‍सलेकन के कसबों पर कब्‍जा कर लिया। और 18 से 21 मार्च के अल्‍पकाल में ही उन्होंने रीशवेहर को राहिइन के किनारे वेसल तक पीछे धकेल दिया।

प्रतिक्रांति की असफलता के बाद, 20 मार्च को ए.डी.जी.बी. ने आम हड़ताल की समाप्ति की घोषणा कर दी। और 22 मार्च को एसडीपी तथा यूएसपीडी ने भी वही किया।

24 मार्च को सामाजिक जनवादी सरकार, एसडीपी, यूएसपीडी तथा केपीडी का एक हिस्‍सा बीलफेल्‍ड में एक समझौते पर पहुँच गए। उन्होंने युद्ध विराम की, मजदूरों के निरस्‍त्रीकरण की तथा उन मजदूरों की मुक्ति की घोषणा कर दी जिन्‍होंने “गैर-कानूनी” काम किये थे। ‘लाल सेना’ के एक बड़े हिस्‍से ने समझौते को स्‍वीकार नहीं किया और संघर्ष जारी रखा।

30 मार्च को सामाजिक जनवादी सरकार और रीशवेहर ने मजदूरों को एक अल्‍टीमेटम दिया : या तो फौरन समझौता स्‍वीकार करो या फिर रीशवेहर आक्रमण शुरू करेगा (इस बीच बावेरिया, बर्लिन, उत्‍तरी जर्मनी, तथा बाल्टिक से फ्रीकापर्स के आने से रीशवेहर की शक्ति चौगुणी हो गई थी)। स्‍वतंत्रों की गद्धारी, केपीडी (एस) तथा सिंडीकेलिस्टों की मध्यमार्गी सोच तथा लाल-सेना के तीन केन्‍द्रों में प्रतिद्वन्द्विता के कारण विभिन्‍न मजदूर इकाईयों में समन्‍वय अब निम्‍नतम स्‍तर पर था। रीशवेहर तथा विशाल सफेद सेनाओं ने सभी मोर्चों पर जबरदस्‍त आक्रमण शुरू किया : 4 अप्रैल को डीसबर्ग तथा मुलहीम, तथा उसके बाद 5 को डार्टमुंड और 6 को गेल्‍सनकिर्चन का पतन हो गया।

फिर एक बहशी सफेद आतंक शुरू हुआ| न सिर्फ हथियारबन्‍द मजदूरों को इसका शिकार बनाया गया बल्कि उनके परिवारों तथा युवा मजदूरों का, जिन्‍होंने जख्‍मी जुझारूओं की मोरचे से निकल जाने में मदद की थी, भी नरसंहार किया गया।

रुहर की ‘लाल सेना’ 80,000 से 1,20,000 तक मज़दूरों से गठित थी। यह तोपखाना और एक छोटी-सी वायु सेना गठित करने में सफल रही थी। संघर्षों के विकास के चलते इसके तीन सैनिक केन्‍द्रों के गठन हुआ:

हेगन : यूएसपीडी की अगुवाई में था और उसने बेझिझक बीलफेल्‍ड समझौते को स्‍वीकार किया।

ऐस्‍न : केपीडी तथा वामपंथी स्‍वतंत्रों के नेतृत्‍व में यह मार्च 25 की सेना के सर्वोच्‍च केन्‍द्र के रूप में स्वीकृत था। जब 30 मार्च को सामाजिक जनवादी सरकार ने मजदूरों को अल्‍टीमेटम दिया तो इस केंद्र ने आम हड़ताल की ओर वा‍पसी का, जबकि मजदूर पहले ही सशस्‍त्र थे तथा लड़ रहे थे, का अत्‍याधिक संदिग्‍ध आवाहन किया।

मुलहीम : यह वामपंथी कम्‍युनिस्‍टों तथा क्रांतिकारी संघाधिपत्‍यवादियों के नेतृत्‍व में था और ऐस्‍न के सैनिक ‘केन्‍द्र’ का पूर्णतया अनुसरण करता था। लेकिन जब ऐस्‍न ने बीलफेल्‍ड समझौते प्रति मध्‍यमार्गी रूख अपनाया तो मुलहीम केन्‍द्र ने ‘‘अन्‍त तक संघर्ष’’ का नारा अपनाया। यूएसपीडी(एस), केपीडी (एस) तथा एफएयूडी (एस) के तीन नेतृत्‍वों ने वही नीच पोजीशन अपनाई और घोषित किया कि वे इन संघर्षों को दुस्‍साहसिकतावादी मानते हैं।

किसी राष्‍ट्रीय जैनट्रेल ने इन संघर्षों का नेतृत्‍व नहीं संभाला। स्‍थानीय सर्वहारा आन्‍दोलन ने स्‍थानीय स्‍तर पर अपनी शक्ति की सीमाओं में केन्‍द्रीयकरण की ओर अपने संकल्‍प को प्रकट किया। मध्‍य जर्मनी में भी मजदूरों ने अपने-आप को हथियारबन्‍द किया और कम्‍युनिस्‍ट एस होल्‍ज के नेतृत्‍व में हाले के इर्द-गिर्द के नगरों में विद्रोह संगठित किये। लेकिन आन्‍दोलन आगे नहीं बढ़ पाया। क्‍योंकि केपीडी (एस), जो चेमनित्‍ज में बहुत मजबूत थी तथा सबसे बड़ी पार्टी थी, ने सामाजिक जनवादियों तथा स्‍वतंत्रों की सहमति से मजदूरों को हथियारबन्‍द करने और एबर्ट की सरकार में वापिसी का इन्‍तजार करने... में अपने आपको सन्‍तुष्‍ट रखा

चेमनित्‍ज की मजदूर कौंसिल की अगुवाई ब्रैंडलर कर रहा था। उसकी नज़र में एक स्‍थानीय कम्‍युनिस्‍ट लीडर के रूप में उसका रोल था होल्‍ज के नेतृत्‍व में कम्‍युनिस्‍टों, जो चेमिनित्‍ज तथा पास के अन्‍य इलाकों में रीशवेहर द्वारा छोड़े गए बहुतेरे हथियारों से अपने आपको लेस करना चाहते थे, तथा सामाजिक जनवादियों, जो क्रान्तिकारियों पर आक्रमण के लिए सदैव तैयार थे और जिन्होंने उनके खिलाफ स्‍था‍नीय बुर्जुआजी के हथियारबन्‍द सफेद ग्रुपों (हीमवेयर) को उतारने के अनेक प्रयास किया, के बीच संघर्ष फूट पड़ने से रोकना।

केपीडी (एस) का मध्‍यममार्गी रूख इस तथ्‍य से पूर्णतया नंगा हो जाता कि जब मजदूर संघर्षरत थे, लेवी जैनट्रेल ने 26 मार्च को सामाजिक जनवादियों तथा स्‍वतंत्रों की मिली-जुली ‘‘मजदूर सरकार’’ बनाने की सूरत में, ‘‘निष्‍ठावान विपक्ष’’ के रूप मे काम करने का नारा दिया। केपीडी (एस) के मुख्‍पत्र डाई रोट फाहन ने लिखा (नं. 32, 1920):

‘‘निष्‍ठावान प्रतिपक्ष को हम इस प्रकार समझते हैं: हथियारबन्‍द सत्‍ताहरण के लिए कोई तैयारी नहीं, अपने लक्ष्‍यों तथा समाधानों के लिए पार्टी ऐजीटेशन को पूर्ण आजादी।’’

इस प्रकार केपीडी ने अधिकारिक रूप से अपने क्रांतिकारी लक्ष्‍यों को त्‍याग दिया। जर्मनी सर्वहारा में क्रांतिकारी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की आवश्‍यकता सदैव से अधिक जरूरी बना गई।

इस प्रकार, तीसरे इन्‍टरनेशनल के अधिकारिक सेक्‍शन की गद्धारी के समक्ष यह एक स्‍वाभाविक ऐतिहासिक निष्‍कर्ष था कि वामपंथी कम्‍युनिस्‍टों ने अगले माह (अप्रैल 1920) केएपीडी (जर्मन कम्‍युनिस्‍ट मजदूर पार्टी) का गठन किया।

जर्मन वाम तथा तीसरे इंटरनेशनल में यूनियनों का सवाल से इस उद़ृण को किसी टिप्‍पणी की जरुरत नहीं। (1972 में इस रचना के आधार पर बोरदिगिस्ट पीसीआई का एक अहम हिस्सा उससे अलग हो गया।)

इन महीनों के दौरान एक और महत्‍वपूर्ण घटना घटी। ब्रीमेन लिंक का केपीडी(ओ) को छोडना तथा केपीडी (एस) में उसकी वापसी। यहां इसने फ्रोलिच तथा कार्ल बेकर के नेतृत्‍व में अन्‍दरूनी प्रतिपक्ष का रोल अदा किया। (अगले सालों और खासकर 1921 की बसंत में बेकर की पोज़ीशनों के विकास को हम बाद में देखेंगे।) हमारे पास “वामपंथी कम्युनिज़्म” पर इस गंभीर चोट तथा लेवी नेतृत्व की भारी जीत को समझने तथा उस पर निर्ण्य लेने के लिए सारी समग्री नहीं है। जिस चीज ने निस्‍संदेह ब्रीमेन ग्रुप के निर्णय को प्रभावित किया वह थी कम्‍युनिस्‍ट इंटरनेशनल, जो केपीडी (एस) का समर्थन कर रहा था, के प्रति वफादारी की उसकी भावना और लाफनबर्ग तथा वोल्‍फहीम के हैम्‍बर्ग ग्रुप के प्रति उसका स्‍पष्‍ट विरोध|

अब तक हमने उन यूनियनों, कौंसिलों तथा ‘वर्करज़ एसोसिऐशनों’ की बात नहीं की है जो जर्मन आंदोलन में बहसों तथा मतभेदों के मुख्य मुद्दे थीं। इस सवाल की जटिलता ने हमे मज़बूर किया कि ‘यूनियनों के सवाल’ को स्पष्टतया से उठाने से पह्ले हमे अन्य सवालों से निपट लें। अपनी अगली रचना में हम यही करेंगे।

एस,  आईआर-2, जुलाई, 1975 [हिन्‍दी में कम्‍युनिस्‍ट इंटरनेशनलिस्‍ट, बुलेटीन 3, अक्तूबर

फुटनोट:

  1. इतिहासकारों तथा इतिहास ने ‘लिंक्सरेडिक्लेन’ शब्द का इस्तेमाल ब्रेमेन तथा हेमबर्ग ग्रुपों के लिये और बाद में केऐपीडी तथा यूनियेन (वर्करज़ एसोसिएशन) के लिए किया है। इसके विपरीत, ‘अल्ट्रालिंक’ शब्द बाद के सालों में केपीडी के भीतर वमपंथी विपक्ष (फ्रीसलेण्ड-फिशर-मासलोव) के वर्णन के लिए काम लाया गया था।
  2. ब्रेमेन में नेवी के गोदी मज़दूर इस प्रकाशन के चंदा देने वाले थे।
  3. रूस की घटनाओं की व्यख्या को लेकर ब्रेमेन कम्युनिस्टों तथा स्‍पार्टकिस्टों में बहुत से मतभेद थे। हमे यहां सिर्फ ‘क्रांतिकारी दहशत’ के सवाल का जिक्र करेंगे। ब्रेमेन ग्रुप की तरफ से नीफ ने क्रांतिकारी लडाई में वर्ग दहशत का इस्तेमाल खारिज़ करने की रोज़ा लुग्जमवर्ग की पोजीशन की निन्दा की।
  4. स्‍पार्टकिस्ट गोथा में यूएसपीडी में शामिल हुए थे।
  5. कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की चौथी कांग्रेस (नवंबर 1924) में रादेक फिर इसी पोजीशन को दोहराया। उसने कहा कि “कैसर का तख्ता पल्ट कर हम पर मेहरबानी करने के लिए” हमें सामाजिक जनवाद का शुक्रिया अदा करना चाहिए।
  6. यह याद रखने की बात है कि कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की पहली कांग्रेस में केपीडी के प्रतिनिधि को इंटरनेशनल की स्थापना के खिलाफ वोट देने का आदेशा था। यह अन्य प्रतिनिधियों के ज़ोर देने तथा दबाव तले ही था कि एब्र्लेन ने मतदान में भाग नहीं लिया।
  7. ‘राष्ट्रीय बोल्शेबिज़म’ की नीति एक बार फिर कोई बखेडा किये बिना केपीडी द्वारा 1923 अपनाई गई। ब्रेंडलर तथा थालहाईमर घोषणाएँ की:

जहां तक वह साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रतिरक्षात्मक लडाई लड रहा है, जर्मन पूँजीपति वर्ग इससे पैदा परिस्थिति में वस्तुगत तौर पर एक क्रांतिकारी रोल अदा कर रहा है। पर एक प्रतिक्रांतिकारी वर्ग होने के नाते वह इस समस्या के एकमात्र उपलब्ध समाधान का सहारा नहीं ले सकता।इन हालातों में सर्वहारा की जीत की पूर्वशर्त है फ्रांसीसी पूँजीपति वर्ग के खिलाफ संघर्ष और इस संघर्ष में जर्मन पूँजीपति वर्ग को सहयोग देने की उसकी क्षमता, पूँजीपति वर्ग द्वारा तोड़-फोड़ का शिकार प्रतिरक्षात्मक लडाई की अगुआई संभाल कर।

और जून 1923 के इम्प्रेकोर में पाठक निम्न पढ सकते हैं:1920 में राष्ट्रीय बोल्शेबिज़म जनरलों को बचाने के लिए एक गठबंधन ही हो सकता था जिन्होंने अपनी जीत के फौरन बाद कम्युनिस्ट पार्टी को कुचल दिया होता। आज इस तथ्य का सूचक है कि हर कोई मानता है कि मसले का एकमात्र हल कम्युनिस्टों के पास है। आज हम ही एकमात्र हल हैं। जर्मनी के अन्दर राष्ट्रीय तत्व पर कड़ा ज़ोर उसी तरह एक क्रांतिकारी कार्य है जैसे उपनिवेशों में। (ज़ोर हमारा) 

  1. जून 19 से पहले इसे फ्रिएन गेवेर्क्शेफटेन कहा जाता था।
  2. फएयूडीएस दिसंबर 1919 में स्थापित एक एनार्को-सिडीकेलिस्ट यूनियन संगठन था।