9. मोर्चों की नीति : सर्वहारा को पटरी से उतारने की रणनीति

पतनशील पूँजीवाद के तहत, जब सिर्फ सर्वहारा इंकलाब ही ऐतिहासिक रूप से प्रगतिशील है, क्रांतिकारी वर्ग और शासक वर्ग के किसी भी गुट, वह चाहे कितना भी ''प्रगतिशील', ''जनवादी'' अथवा "लोकप्रिय" होने का दावा करे, के बीच क्षणिक रूप से भी कोई कार्यभार सॉंझे नहीं हो सकते। पूँजीवाद के चढ़ाव के दौर के विपरीत, व्‍यवस्‍था की पतनशीलता किसी भी पूँजीवादी गुट के लिए प्रगतिशील रोल अदा करना असंभव बना देती है। विशेषत: पूँजीवादी जनतंत्र, जो 19वीं सदी में सामंतवाद के अवशेषों की तुलना में प्रगतिशली राजनीतिक रूप था, पूँजीवाद की पतनशीलता के दौर में समस्‍त वास्‍तविक राजनीतिक सार खो चुका है। पूँजीवादी जनतंत्र राज्‍य की मजबूत होती सर्वाधिकारवादी ताकत को छिपाते भ्रामक पर्दे का काम करता है, और उसकी वकालत करते पूँजीवादी गुट भी अपने बाकी वर्ग जितने ही प्रतिक्रियावादी हैं।

पहले विश्‍वयुद्ध से ''प्रजातन्त्र'' सर्वहारा के लिए घातक अफीम साबित हुआ है। बहुत से यूरोपीय देशों में युद्ध उपरांत शुरू हुए इन्‍कलाबों को ''प्रजातन्त्र'' के नाम पर ही कुचला गया; ''फासीवाद विरोध'' और ''प्रजातन्त्र'' के नाम पर ही करोड़ों मज़दूरों को दूसरे साम्राज्यावादी युद्द के लिए लामबंद किया गया; और आज ‍िफर पूँजी ''प्रजातन्त्र'' के नाम पर ही सर्वहारा संघर्षों को ''फासीवाद विरुध'',  ''प्रतिक्रिया विरुध'', ''सर्वाधिकारवाद'' के विरुध गठबन्धनों से गुमराह करने की कोशिश कर रही है।

क्‍योंकि फासीवाद एक ऐसे दौर की उत्पति था जब सर्वहारा पहले ही कुचला जा चुका था, आज वह कतई ऐजेडें पर नहीं है, और "फासीवादी खतरे" विषयक सब प्रचार महज़ छलावा हैं। फिर दमन पर फासीवाद का कोई एकाधिकार नहीं है और जनवादी तथा वामपक्षी राजनीतिक धाराएं अगर फासीवाद को दमन के साथ मिलाती हैं तो इसलिए क्‍योंकि वे छिपाना चाहती हैं कि वे खुद दमन की सबसे द़ृढ व्यवसायी हैं और कि वर्ग के क्रांतिकारी आन्‍दोलनों को कुचलने का मुख्‍य भार सदा उन्‍हीं ने वहन किया है।

''लोकप्रिय मोर्चों'' और ''फासीवाद विरोधी मोर्चों'' की तहर ''संयुक्‍त मोर्चें'' की कार्यनीति भी सर्वहारा संघर्ष को विपथ करने का एक मुख्‍य हथियार साबित हुई है। जो कार्यनीति यह वकालत करती है कि क्रांतिकारी संगठन इन तथाकथित मज़दूर पार्टियों के साथ गठजोड़ का अवाहन करें ताकि उन्हें एक कोने में धकेल कर नंगा किया जा सके, वह इन पूँजीवादी पार्टियों के "सर्वहारा" चरित्र विषयक भ्रमों को बनाये रखने और उनसे मज़दूरों के अलगाव को टालने में ही कामयाब हो सकती है।

समाज के अन्‍य सभी वर्गों के समक्ष सर्वहारा की स्‍वायतत्ता उसके संघर्षों को क्रांति की ओर बढ़ाने की पहली पूर्व शर्त है। दूसरे वर्गों अथवा तबकों, और खासकर बुर्जुआजी के गुटों के साथ सभी गठजोड़ मज़दूर  वर्ग को अपने दुश्‍मन के सामने निहत्‍था करने की ओर ही ले जा सकते हैं, क्‍योंकि ये गठजोड़ उससे वह एकमात्र धरातल - उसका अपना वर्ग धरातल - छुड़वाते हैं जिस पर वह अपनी श‍‍क्‍ति बढ़ा सकता है। वर्ग से वह धरातल छुड़वाने की कोशिश करती कोई राजनीतिक धारा सीधे बुर्जुआजी के हितों की सेवा कर रही है।