‘चीनी क्रान्ति’ पर

आधि‍कारक इति‍हास मुताबि‍क 1948 में चीन में लोकप्रिय इंकलाब विजयी रहा। जनतंत्रवादी पश्‍चि‍म एवम माओवादी दोनो इस वि‍चार के बराबर पक्षधर हैं। यह स्‍तालि‍नवादी प्रति‍क्रांति‍ जनि‍त तथाकथि‍त “समाजवादी देशों” की रचना वि‍षयक वि‍शाल भ्रमजाल का हि‍स्‍सा है। यह तय है कि‍ 1919 और 1927 के बीच चीन महत्‍वपूर्ण मज़दूर आंदोलन में से गुज़रा जो उस बक्‍त दुनि‍या को हि‍लाती अंतर्राष्‍ट्रीय लहर का अभि‍न्‍न हि‍स्‍सा था। पर यह आंदोलन मज़दूर वरग के संहार द्वारा डूबो दि‍या गया। पूंजीवादी प्रचारक जि‍से “चीनी इंकलाब की वि‍जय” के रूप में पेश करते हैं वह केवल राज्‍यपूंजीवादी शासन के माओवादी रूप की स्‍थापना थी। यह सर्वहारा क्रांति‍ की हार के बाद 1928 से चीन में भडके साम्राज्‍यवादी युद्व के दौर का चरम था।

2003 का इराक युद्ध

एक बार फि‍र मध्‍यपूर्व आतंक की गि‍रफ्त में है। एक बार फिर इराक पर बंमों की आग बरसाई जा रही है। एक तरफ “सभ्‍य” ताकतें पहले ही भुखमरी की शि‍कार आबादी पर मौत तथा बदहाली बरपा कर रही हैं। दूसरी ओर सारी दुनि‍या को झूठों की बाढ में डुबोया जा रहा है। ताकि‍ जंग उचि‍त ठहराई जा सके। ताकि‍ जंग के हर सच्‍चे वि‍रोध को वि‍कृत तथा भ्रमि‍त कि‍या जा सके।…

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