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कॉकरोच जनता पार्टी: मज़दूर वर्ग के ख़िलाफ़ एक बुर्जुआ आंदोलन

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  • कम्युनिस्ट इंटरनेशनलिस्ट – 2020s का दशक
  • Communist Internationalist - 2026

जुलाई में 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के समर्थन में भारत भर में जो लामबंदी हुई, उसे मीडिया और बुर्जुआ राजनीतिक ढांचे के अलग-अलग गुटों ने "युवाओं का विद्रोह," "नई लोकतांत्रिक जागृति," या यहाँ तक कि "पीढ़ीगत विद्रोह" या "जेन-ज़ी  विद्रोह" कहकर खूब सराहा। इस चर्चा की वजह मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की एक टिप्पणी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि कुछ युवा बेरोजगार मजदूर  और कार्यकर्ता  व्यवस्था  पर हमला करने वाले "कॉकरोच" की तरह व्यवहार करते हैं।

अंडरग्रेजुएट मेडिकल प्रोग्राम में एडमिशन के लिए होने वाले नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET) में हुए घोटाले के बाद यह आंदोलन तेज़ी से फैला। इस घोटाले में परीक्षा के सवाल पहले ही लीक हो गए थे। इस घटना ने उन युवाओं के बीच गहरा सामाजिक गुस्सा पैदा किया, जिनके सामने सामाजिक भविष्य की उम्मीदें खत्म होती दिख रही थीं। यह गुस्सा भारत और दुनिया भर में आज पूंजीवाद की वजह से पैदा हुई गहरी अव्यवस्था को दिखाता है, जहाँ जीवन की स्थितियों में सुधार का वादा कमज़ोर पड़ गया है और युवा पीढ़ी को भविष्य एक बंद रास्ते जैसा लगने लगा है।

फिर भी, जिस दायरे में यह गुस्सा ज़ाहिर किया गया है, वह तटस्थ नहीं है। CJP के आंदोलनों में भले ही भारी भागीदारी और ज़बरदस्त जज़्बात हों, लेकिन ये मज़बूती से बुर्जुआ लोकतंत्र के वैचारिक और राजनीतिक ढांचे में ही बंधे हुए हैं। ये न तो मज़दूर वर्ग के हितों को ज़ाहिर करते हैं और न ही मज़दूर वर्ग के संघर्ष का रास्ता खोलते हैं।

साल 2026 में भारत एक गहरे सामाजिक संकट से गुज़र रहा है। आर्थिक मंदी, महंगाई का दबाव और वैश्विक अस्थिरता ने वेतन, रोज़गार और जीवन-स्तर पर हमलों को और तेज़ कर दिया है। युवा तेज़ी से बढ़ती बेरोज़गारी, अनिश्चित और असंगठित काम, बिगड़ते जीवन-स्तर, संस्थानों पर घटते भरोसे और सालों की पढ़ाई के बाद भी एक स्थिर भविष्य न बना पाने की बढ़ती मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। इन्हीं हालात के बीच NEET घोटाला हुआ और युवाओं का गुस्सा भड़क उठा।

मज़दूरों के महत्वपूर्ण संघर्ष

हालाँकि, बुर्जुआ दायरे में होने वाले इन आंदोलनों के उलट, एक अहम घटना पहले ही हो चुकी थी: और इस बार यह घटना मज़दूरों के संघर्षों के फिर से ज़ोर पकड़ने से जुड़ी थी। 2026 के वसंत में, भारत में कई औद्योगिक इलाकों में मज़दूरों के बड़े पैमाने पर लामबंद होने की अहम घटनाएँ देखी गईं। भले ही ये संघर्ष असमान और कमज़ोर थे, लेकिन ये बढ़ते शोषण के ख़िलाफ़ मज़दूर वर्ग की सच्ची प्रतिक्रिया को दर्शाते हैं।

अप्रैल की शुरुआत में, हरियाणा राज्य में नई दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम में मानेसर स्थित होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया (HMSI) के कॉन्ट्रैक्ट वर्करों ने गुज़ारे लायक वेतन की मांग करते हुए काम बंद कर दिया। यह आंदोलन तेज़ी से पूरे इलाके की ऑटो पार्ट्स बनाने वाली फैक्ट्रियों, कपड़ों की यूनिट्स और इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स में फैल गया। हरियाणा में वेतन में लंबे समय से रुकी हुई बढ़ोतरी - जो ग्यारह साल में पहली बार हुई थी - ने शोषण की गंभीरता को उजागर कर दिया: 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी के बाद भी, न्यूनतम वेतन वर्करों की ₹20,000 (€181) प्रति महीने की मांग से कम ही रहा। इस आंदोलन की जड़ें वर्करों के रहन-सहन की वास्तविक स्थितियों और पूंजी व सरकार के सामने उनके सामूहिक संघर्ष में थीं।

अप्रैल के बीच तक, यह अशांति राज्य की सीमाओं को पार करके उत्तर प्रदेश पहुँच गई और नोएडा में ज़ोर-शोर से भड़क उठी। सोशल मीडिया के ज़रिए संगठित होकर, लगभग अस्सी फ़ैक्टरियों के मज़दूर काम छोड़कर बाहर निकल आए और ऐसी मज़दूरी की माँग करने लगे जिससे गुज़ारा हो सके। स्थानीय प्रशासन ने ‘धारा 163’ लागू कर दी, जिसके तहत लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगा दी गई। ये विरोध-प्रदर्शन हिंसक झड़पों में बदल गए; गाड़ियाँ फूँक दी गईं, पुलिस ने आँसू गैस छोड़ी और सैकड़ों मज़दूरों को गिरफ़्तार कर लिया गया।

ये कोई 'दिखावटी' टकराव नहीं थे, बल्कि मज़दूरों के असली गुस्से और निराशा का इज़हार थे। इसकी वजह थी मज़दूरी का न बढ़ना, महंगाई और हरियाणा व उत्तर प्रदेश के बीच मज़दूरी में अंतर। फरीदाबाद, पानीपत और सूरत में भी ऐसे ही संघर्ष हुए, जहाँ टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स और केमिकल फ़ैक्टरियों के मज़दूरों ने गुज़र-बसर लायक मज़दूरी की माँग और काम की बेहद खराब स्थितियों के विरोध में एकजुट होकर आवाज़ उठाई। यूनियनों और वामपंथी पार्टियों ने इन संघर्षों को उनकी राजनीतिक एकता मज़बूत करने की दिशा से जल्द ही भटका दिया, लेकिन फिर भी, उन्होंने मज़दूर वर्ग में बढ़ते हुए संघर्ष-भाव को उजागर किया।

ये लामबंदियां कार्यस्थलों से उभरीं, सामूहिक मांगें रखीं, राज्य के सामने आईं और वर्ग-संघर्ष के भौतिक आधार को उजागर किया। ये आज के संघर्ष के लिए भारत में सर्वहारा प्रतिरोध का वास्तविक आधार हैं। इसी संदर्भ में — वर्ग-संघर्ष की गतिशीलता को विस्तार देने और विकसित करने की आवश्यकता के संदर्भ में  CJP की लामबंदियों का विश्लेषण किया जाना चाहिए।

CJP: मज़दूर वर्ग की चेतना पर हमला

किसी सामाजिक आंदोलन का राजनीतिक स्वरूप उसके प्रतिभागियों की सामाजिक बनावट से नहीं, बल्कि उसकी मांगों और उस दायरे से तय होता है जिसमें वह लोगों को एकजुट करता है। ऊपर बताए गए 'स्प्रिंग मूवमेंट' के उलट, CJP के आंदोलन पूरी तरह से बुर्जुआ  दायरे में चल रहे थे। इन आंदोलनों के नारे - जवाबदेही, पारदर्शिता, परीक्षा सुधार, लोकतांत्रिक अधिकार, मंत्री का इस्तीफ़ा, बेहतर शासन - बुर्जुआ लोकतंत्र की आम मांगें थीं। इनका मकसद राज्य के कामकाज को बेहतर बनाना था। और इस लिहाज़ से, इनमें मज़दूर वर्ग  के हितों की कोई बात नहीं थी।

इसमें शामिल होने वाले लोग नागरिक, छात्र, परीक्षा देने वाले उम्मीदवार और एक ऐसे राजनीतिक प्रोजेक्ट के समर्थक थे, जो एक साधारण आलोचनात्मक विरोध से निकला था। वे मज़दूरों के तौर पर एकजुट नहीं हुए। न तो कोई आम सभाएँ हुईं, न हड़तालें, न बड़ी जन-सभाएँ और न ही सामूहिक संघर्ष के कोई संगठन बने। यह आंदोलन प्रतीकात्मक मार्च पर टिका था, जिसमें लोगों की छवि सिर्फ़ आलोचना करने वाले नागरिकों की थी। ये तरीके बुर्जुआ विरोध-संस्कृति का हिस्सा हैं।

इस आंदोलन के वैचारिक ढांचे ने इस स्वरूप को और मज़बूत किया। लोगों को एकजुट करने के पीछे कई बातें थीं: जैसे "जनता बनाम भ्रष्टाचार" की उदारवादी-लोकतांत्रिक सोच, प्रशासनिक विफलता की नैतिक आलोचना, पीढ़ी-विशेष की विचारधारा, और भारत के युवाओं की सुरक्षा से जुड़ी राष्ट्रवादी बातें। ये विचारधाराएं मज़दूर वर्ग को बांटती हैं, वर्ग-संघर्ष को खत्म करती हैं और लोकतांत्रिक सुधारों को लेकर गलतफहमियां पैदा करती हैं।

इस तरह, इस आंदोलन ने बुर्जुआ वर्ग  के हितों को साधा है; इसने मज़दूर वर्ग के दायरे से जुड़े सामाजिक गुस्से का ध्यान भटकाकर पूरे भारत में चल रहे वर्ग-संघर्ष की अहम भूमिका को धुंधला कर दिया है। जहाँ मानेसर और नोएडा में मज़दूर ज़्यादा वेतन के लिए लड़ रहे थे, वहीं उन पर आपराधिक व्यवहार का आरोप लगाया गया और पुलिस के दमन का सामना करना पड़ा; जबकि मीडिया ने CJP के लामबंदी प्रयासों को 2026 के "असली" सामाजिक आंदोलन के तौर पर पेश किया।

युवाओं का भविष्य लोकतांत्रिक सुधार, पीढ़ीगत आंदोलनों, प्रतीकात्मक विरोध-प्रदर्शनों या बेहतर शासन की माँगों में नहीं है। यह मज़दूर वर्ग के स्वतंत्र, सामूहिक और अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष में निहित है।

सिर्फ़ ऐसा संघर्ष ही सामाजिक गुस्से को पूंजीवादी शोषण और पूंजीवादी व्यवस्था के लिए एक चुनौती में बदल सकता है। मज़दूरों के असली संघर्ष—जिन्हें पूंजीपति वर्ग ने जान-बूझकर हाशिए पर धकेल दिया है—इस लक्ष्य की ओर जाने वाले अभी भी बहुत लंबे और मुश्किल रास्ते को आसान बनाते हैं। वे उस असली ज़मीन को सामने लाते हैं जिस पर मज़दूर वर्ग, पूंजी के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई में, खुद को संगठित कर सकता है और अपनी चेतना को विकसित कर सकता है।

क्रांतिकारियों का काम है CJP जैसे आंदोलनों के बुर्जुआ  स्वरूप को बेनकाब करना, लोकतांत्रिक भ्रमों का मुकाबला करना, मजदूर वर्ग के वास्तविक संघर्षों को उजागर करना और युवाओं के गुस्से को इस वर्ग के संघर्ष और हितों से फिर से जोड़ने में मदद करना। CJP के प्रदर्शनों में जो गुस्सा दिखा है, वह वास्तविक है और जिस संकट ने इसे पैदा किया है, वह बहुत गहरा है। असली भविष्य केवल एक ऐतिहासिक वर्ग के रूप में मजदूरों के सामूहिक संघर्ष में ही निहित है।

आईसीसी, अगस्त 2026

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