संघर्ष हमारे सामने है !

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बीते वर्ष, वैश्विक पूँजीवाद के प्रमुख देशों  और दुनियां भर में मजदूरों के संघर्ष फूट पड़े हैं.  हड़तालों की यह श्रंखला 2022 की गर्मियों में ब्रिटेन से शुरू हुई और तब से फ़्रांस, जर्मनी, स्पेन, नीदरलेंड, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, कोरिया तथा तमाम अन्य देशों के मजदूर संघर्ष में कूद पड़े हैं. श्रमिक वर्ग, रहन- सहन और कार्य करने की बिगडती परस्थितियों में दिन पर दिन आ रही भारी गिरावट, असमान को छूती मंहगाई, आर्थिक अस्थिरता के परिणामस्वरूप, बड़े पैमाने पर बढ़ती बेरोजगारी, पारिस्थितिकी जकडन तथा उक्रेन में बर्बर युद्ध से जुडी सैन्य बर्बरता की तीव्रता के कारण, फूटे गुस्से के खिलाफ हर जगह मजदूर वर्ग सर उठा रहा है.    

तीन दशकों से संघर्षों की अभूतपूर्व लहर

तीन दशकों की इतनी लम्बी अवधि में, दुनियां के इतने सारे देशों में एक साथ संघर्ष की ऐसी लहर नहीं देखी है. पूर्वी गुट के 1989 में  पतन और कथित “ साम्यवाद की म्रत्यु” के अभियानों ने विश्व स्तर पर वर्ग संघर्ष में गहरी गिरावट ला दी थी. यह प्रमुख घटना, स्तालिनवादी गुट और दुनियां की दो सबसे बड़ी शक्तियों में से एक, यूएसएसआर का विस्फोट, पूंजीवादी पतन के नये और उससे भी अधिक विनाशकारी चरण में प्रवेश की सबसे प्रभावशाली अभिव्यक्ति जो पूँजीवाद के विघटन के रूप में प्रकट हुई. [1] अपने पैरों पर खड़े समाज का सडना, सभी स्तरों पर बढती हिंसा और अराजकता, शून्यवादी और निराशाजनक वातावरण, सामाजिक परमाणुकरण की प्रव्रर्ति, इन सभी का वर्ग संघर्ष पर नकारत्मक प्रभाव पडा. इस प्रकार हमने, 1968  से शुरू होने वाली पिछली अवधि की तुलना में जुझारूपन में काफी कमजोरी देखी है. ब्रिटेन में तीन दशकों से अधिक समय से संघर्ष के लम्बे अनुभव वाले सर्वहारा वर्ग के मजदूर वर्ग में पदत्याग की प्रवृति देखी गई, वह, इस पीछे हटने की  वास्तविकता को दर्शाता है. पूंजीपति वर्ग के हमलों, बेहद क्रूर “सुधारों” बड़े पैमाने पर गैर- औध्योगीकरण और जीवन स्तर में काफी गिरावट का सामना करते हुए,1985 में थैचर द्वारा खनिकों को दी गई करारी हार के बाद से देश के श्रमिकों ने कोई महत्वपूर्ण लामबंदी नहीं देखी. हालांकि, मजदूर वर्ग ने यदा-कदा जुझारूपन के संकेत दिए हैं और संघर्ष के अपने हथियारों को फिर से इस्तेमाल करने की कोशिश की है. (फ़्रांस में 2006 में कांटराट डी प्रीमियर एम्प्लोय (सीपीई) के खिलाफ, 2011 में स्पेन में इन्डिगनोज आन्दोलन, पेंशन सुधार के खिलाफ फ़्रांस में (2019 पहली लामबंदी,यह साबित करते हुए कि इसे, किसी भी तरह से इतिहास के मंच से हटाया नहीं गया है, इसकी लामबंदी काफी हद तक अनुवर्ती  कार्रवाई के बिना बनी हुई है. अधिक वैश्विक आन्दोलन फिर से शुरू करने में असमर्थ है. ऐसा क्यों था? क्योंकि न केवल श्रमिकों ने पिछले कुछ वर्षों से अपनी लड़ाई की भावना खो दी बल्कि, उन्हें अपने वर्ग में वर्ग चेतना का भी गिरावट का  सामना करना पड़ा है, जिसे पुनः हासिल करने के लिए उन्होंने 1970 और 1980 के दशक में बहुत संघर्ष किया था. मजदूर वर्ग का अपने संघर्षों से सबक, यूनियनों के साथ अपने टकराव, “लोकतान्त्रिक” राज्य द्वारा बिछाए गए जाल में अपना आत्मविश्वास खोना, एकजुट होने की क्षमता, सामूहिक रूप से लड़ने की क्षमता को काफी हद तक भूल गए थे. यहाँ तक कि वे काफी हद तक अपने कार्यभार को भी भूल गए थे. पूंजीपति वर्ग के विरोधी और अपने क्रांतिकारी द्रष्टिकोण रखने वाले वर्ग के रूप में पहचाना. इस तर्क के आधार पर, स्तालिनवाद की भयावहता के साथ साम्यवाद वास्तव में मृत लग रहा था और मजदूर वर्ग अब अस्तित्व मे नहीं था.   

वर्ग संघर्ष की गतिशीलता का विराम

और फिर भी,कोविद-19 की वैश्विक महामारी के बाद से पूंजीवादी व्यवस्था में सड़ांध की प्रक्रिया में उल्लेखनीय सामना करना पड़ा. [2]  स्थिति को और भयावह बनाने के लिए उक्रेन में युद्ध में हो रहे नरसंहार और श्रन्खलावद्ध प्रतिक्रियाओं के साथ इसने आर्थिक, सामाजिक, पारस्थितिक और राजनातिक स्तरों पर भी उकसाया है, फिर भी मजदूर वर्ग हर जगह विरोध में सर उठा रहा है, लड़ने के लिए आगे आरहा है और तथा कथित “सार्वजनिक “ भलाई के नाम पर बलिदान करने के लिए इंकार कर रहा है, पूंजीपति वर्ग के हमलों के प्रति यह एकमुश्त अधिचर्त्मिक प्रतिक्रिया,क्या यह एक संयोग है? नहीं! “ बहुत हो गया” का यह नारा, इस सन्दर्भ में पूंजीवादी व्यवस्था की व्यापक अस्थिरता स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि वर्ग की भीतर मानसिकता में वास्तविक परिवर्तन हो रहा है. जुझारूपन की ये सभी अभिव्यक्तियां एक नई स्थिति का हिस्सा हैं जो वर्ग संघर्ष के लिए खुल रही हैं. एक नया चरण जो पिछले तीन दशकों की निष्क्रियता, भटकाव को तोड़ता है.   

गत वर्ष, संघर्षों का एक साथ विस्फोट कहीं भी नहीं हुआ. वे पिछले परीक्षणों के दौरान किए गये प्रयास और त्रुटी की एक श्रंखला के माध्यम से वर्ग में प्रतिबिम्ब की पूरी प्रक्रिया का उत्पाद है, जिसने पहले से ही, 2019 के अंत में, “पेंशन सुधार” के खिलाफ फ़्रांस में पहली लामबंदी के दौरान, आईसीसी ने पीढ़ियों और विभिन्न क्षेत्रों के बीच एकजुटता की मजबूत आवश्यकता की अभिव्यक्ति की पहचान की थी. इस आन्दोलन के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ-साथ फिनलेंड में भी दुनियां भर के अन्य मजदूरों के संघर्ष हुए थे, लेकिन मार्च 2020 में कोविड की महामारी के विस्फोट के कारण यह समाप्त हो गया था. इस तरह, अक्टूबर 2021 में भी हडतालें हुईं. संयुक्त राज्य अमेरिका में विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष शुरू हो गया, लेकिन इस बार उक्रेन में युद्ध छिड़ जाने के कारण संघर्ष की गति बाधित हो गई, जिसने शुरू में विशेषकर यूरोप में मजदूरों को पंगु बना दिया.   

प्रयास और भूल तथा परिपक्वता की यह लम्बी प्रक्रिया 2022 की गर्मियों के बाद से पूँजीवाद की अस्थिरता से उत्पन्न होने वाले हमलों के सामने मजदूरों द्वारा अपने स्वयं के वर्ग क्षेत्र में एक निर्धारित प्रतिक्रिया के रूप में सामने आई. ब्रिटेन के श्रमिकों ने अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संघर्ष में एक नये युग की शुरूआत की, जिसे “क्रोध की गर्मी” कहा गया. “बहुत हो गया” का नारा यूनैत्द३  में सम्पूर्ण सर्वहारा संघर्ष के प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया था. यह नारा कोई विशिष्ट मांग को पूरा करने को व्यक्त नहीं करता था, बल्कि शोषण की स्थितियों के खिलाफ एक विद्रोह भर व्यक्त करता था. इससे पता चला कि मजदूर  अब दयनीय समझौतों को निगलने के लिए तैयार नहीं थे, बल्कि दृढ संकल्प के साथ संघर्ष जारी करने के लिए अमादा थे. ब्रिटिश श्रमिकों का आन्दोलन विशेषरूप से प्रतीकात्मक था, क्योंकि 1985 के बाद यह पहली बार है कि श्रमिक वर्ग का यह क्षेत्र केंद्र में आया है, और जैसे ही दुनियां भर में मुद्रास्फीति का संकट और गहरा गया, यूक्रेनी संघर्ष और युद्ध के कारण अर्थव्यवस्था की तीव्रता और गहराया. स्पेन, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्वास्थ्य कार्यकर्ता भी आक्रामक हो गए, जिसके बाद नीदरलेंड में हड़तालों की लहर चल पडी, जर्मनी में परिवहन कर्मचारियों की विशाल हड़ताल, चीन में वकाया वेतन और अतिरेक के खिलाफ 100 से अधिक हड़तालें,  ग्रीस में एक भयानक ट्रेन दुर्घटना के बाद हडताल और प्रदर्शन, पुर्तगाल में उच्च वेतन और बेहतर काम करने की स्थिति की मांग करने वाले शिक्षक, 10,000 सिविल सेवक उच्च वेतन की मांग कर रहे हैं, कनाडा में वेतन, और सबसे ऊपर फ़्रांस में पेंशन सुधार के खिलाफ सर्वहारा वर्ग का एक बड़ा आन्दोलन सभी का ध्यान बर्वस अपनी ओर खींचता है.      

इस दीर्घावधि में, पूंजीवादी मितव्यता के विरूद्ध इस लामबंदी की अत्यंत महत्वपूर्ण प्रकृति इस तथ्य में निहित है कि, इनमें युद्ध का विरोध भी शामिल है. वास्तव में, यदि युद्ध के  था खिलाफ आईसीसी ने पहले ही बता दिया था कि श्रमिकों की प्रतिक्रिया उनकी क्रय शक्ति पर हमलों के प्रतिरोध में प्रकट होगी, जो संकटों की तीव्रता और आपदाओं के बीच अंतरसम्बन्ध के परिणाम स्वरूप होगी, और यह यूक्रेनी “लोगों के वीरतापूर्ण प्रतिरोध का समर्थन के लिए बलिदानों को स्वीकार करने के लिए बुलाये जाने वाले अभियानों के विपरीत भी चलेगा. पिछले वर्ष के संघर्षों के बीज भी यही थे. चाहे, मजदूर अभी तक इस बाबत अनभिज्ञ क्यों न रहे हों; शाशक वर्ग के स्वार्थों के लिए अधिक से अधिक बलिदान देने से इनकार, राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के लिए बलिदान से इनकार और युद्ध के प्रयास के लिए, इस प्रणाली के तर्क को स्वीकार करने से इनकार, जो  मानवता को तेजी से विनाशकारी स्थिति की ओर धकेल रहा है.  

हमें संगठित हो कर एकजुटता से लड़ने की आवश्यकता है!

इन संघर्षों में मजदूरों के मन में एक विचार उभरने लगा है कि “हम सभी एक नाव में हैं.” ब्रिटेन में धरना, प्रदर्शन और हडताल करने वालों ने हमें बताया कि उन्हें लगता है कि वे यूनियनों की कार्पोरेट मांगों से कहीं बड़ी चीज के लिए लड रहे हैं. “ हम सभी के लिए” बैनर, जिसके तहत 27 मार्च को जर्मनी में हडताल हुई, वर्ग में होने वाली सामान्य भावना के लिए महत्वपूर्ण है: हम सभी एक दूसरे के लिए लड़ रहे हैं.” लेकिन फ़्रांस में एक हो कर लड़ने की आवश्यकता सबसे स्पष्ट रूप से व्यक्त की गई थी. यूनियनों ने “ फ़्रांस में गतिरोध लाने लिए कथित “रणनीतिक” क्षेत्रों (जैसे ऊर्जा या कचरा संग्रहण) के पीछे प्राक्सी द्वारा हडताल “ के जाल में फंसा कर आन्दोलन को विभाजित करने और सडाने की कोशिश की. लेकिन मजदूर  सामूहिक रूप से  इसके झांसे में नही आये और एकजुट हो कर लड़ने के लिए प्रतिबद्ध रहे.   

फ़्रांस में तेरह दिनों की लामबंदी के दौरान आईसीसी ने 150,000 से अधिक पर्चे बांटे: ब्रिटेन और अन्य स्थानों पर जो कुछ हो रहा था उसमें रूचि कभी कम नहीं हुई. कुछ प्रदर्शनकारियों के लिए, ब्रिटेन की स्थिति के साथ सम्बन्ध स्पष्ट दिखाई दे रहा था: “यह हर जगह, हर देश में समान है.” यह कोई संयोग नहीं था कि “मोबिलियर नेशनल की यूनियनों को” ब्रिटिश  मजदूरों के साथ एकजुटता” के नाम पर चार्ल्स ||| (तृतीय) की पेरिस यात्रा (रद्द किये जाने ) के दौरान हड़ताल की कार्रवाई का दायित्व लेना पड़ा. फ़्रांस में सरकार के अनमनेपन के बावजूद, पूंजीपति के पीछे हटने या वास्तव में ब्रिटेन या अन्य जगहों पर बेहतर मजदूरी हासिल करने में विफलताओं के बावजूद, श्रमिकों की सबसे बड़ी जीत संघर्ष और जागरूकता ही है. निस्संदेह, उन्हें भले ही, अपनी प्रारम्भिक अवस्था में और अधिक भ्रम था, कि हम एक ही शक्ति का निर्माण करते हैं, कि हम सभी शोषित लोग हें, जो अपने- -अपने कोने में हुई, पूँजी के खिलाफ कुछ नहीं कर सकते हैं, लेकिन संघर्ष में जो एकजुट हो कर, इतिहास में सबसे बड़ी सामाजिक शक्ति बन सकते हैं.

कुछ लोगों का मत है कि मजदूरों को अभी भी संघर्षों को अपने हाथों में लेने की शक्ति और क्षमता पर भरोसा नहीं है. हर जगह यूनियनों ने आंदोलनों पर नियन्त्रण बना रखा है, विभिन्न क्षेत्रों के बीच कठोर अलगाव बनाये रखते हुए, एकता की आवश्यकता को बेहतर ढंग से निष्फल करने के लिए अधिक लडाकू भाषा बोली जा रही है .ग्रेट ब्रिटेन में मजदूर अपनी कम्पनियों की धरना लाइनों के पीछे अलग-थलग रहे, हालांकि, यूनियनों को कथित “एकात्मक” प्रदर्शनों की पैरौडी ( नकल) आयोजित करने के लिए मजबूर होना पड़ा. इसी तरह, फ़्रांस में, जब श्रमिक विशाल प्रदर्शनों में एक साथ आते थे, तो यह हमेशा यूनियनों के नियंत्रण में होता था,                जो श्रमिकों को अपनी कम्पनियों और क्षेत्रों के बैनर के पीछे छिपा कर रखते थे. कुल मिला कर, अधिकांश संघर्षों में कार्पोरेटी कारावास जैसी एक स्थिर स्थिति बनी रही.

ह्ड़तालों के दौरान, पूंजीपति वर्ग, विशेष रूप से इसके वामपंथी गुटों द्वारा बुर्जुआ “अधिकारों”  के भ्रामक क्षेत्र पर क्रोध और आक्रोश बनाये रखने के लिए डिजायन किये गये पारस्थितिकी , नस्लवाद -विरोध,लोकतंत्र की रक्षा, गोरे- काले, नारी- पुरुष या बूढ़े -जवान के बीच भेद बनाये रख, श्रमिक आन्दोलन में भ्रम बनाये रखने के लिए अपना वैचारिक अभियान जारी रखा. फ़्रांस में पेंशन सुधर आन्दोलन के बीच, हमने “ विकास के आस-पास दोनों पर्यावरणवादी अभियानों के विकास तथा “मेगा पूल” और पुलिस दमन के खिलाफ लोकतांत्रिक अभियान को देखा. हालाँकि, श्रमिकों के अधिकांश संघर्ष वर्गक्षेत्र में बने हुए हैं, अर्थात, मुद्रास्फीति अतिरेक सरकारी मितव्यता उपायों आदि के सामने श्रमिकों की भौतिक स्थितियों की रक्षा, इन विचारधाराओं द्वारा महानतकश वर्ग के लिए उत्पन्न खतरा काफी बना हुआ है.                 

कल के संघर्षों की तैयारी  

वर्तमान काल में, कई देशों में संघर्षो का वेग कम हो गया है, लेकिन इसका यह अर्थ यह कतई नहीं कि मजदूर निराश या पराजित हो गये हैं. ब्रिटेन में हड़तालों की लहर पूरे एक साल तक जारी रही, जबकि फ़्रांस में प्रदर्शन पांच महीने तक चले, इस तथ्य के बावजूद कि अधिकांश मजदूरों को शुरू से ही पता था कि पूंजीपति उनकी मांगों को तत्काल ही नही मान लेंगे. नीदरलेंड में सप्ताह- दर सप्ताह, फ़्रांस में माह- दर माह और ब्रिटेन में पूरे एक वर्ष तक मजदूरों ने काम करने से इनकार कर दिया. इन श्रमिकों की लामबंदी ने दिखाया कि मजदूर अपने जीवन स्तर में और गिरावट स्वीकार नहीं करने के लिए दृढ हैं. सत्ताधारी वर्ग के तमाम झूठों के बावजूद संकट थमने वाला नहीं है: आवास, हीटिंग,और भोजन की कीमतें बढना बंद नहीं होने वाली हैं, अतिरेक और असुरक्षित अनुबंध जारी रहेंगे, सरकारें अपने हमले जारी रखेंगी.      

निस्संदेह, संघर्ष की यह नई गतिशीलता अभी अपनी प्रारम्भिक अवस्था में ही है, और मजदूर वर्ग के लिए, “उसकी अभी ऐतिहासिक कठिनाइयाँ कायम हैं. अपने स्वयं के संघर्षों को संगठित करने की क्षमता और इससे भी अधिक अपनी क्रांतिकारी परियोजना के बारे में जागरूक होने की क्षमता अभी भी बहुत दूर है, लेकिन पूंजीपति वर्ग द्वारा रहने और काम करने की स्थितियों पर किये गए क्रूर प्रहारों के सामने बढता जुझारूपन वह उपजाऊ जमीन है, जिस पर सर्वहारा वर्ग अपनी वर्ग पहचान को फिर से खोज सकता है, फिर से जागरूक हो सकता है: कि वह क्या है? जब श्रमिक अपनी ताकत के बारे में वह संघर्ष करता है, जब वह अपनी एकजुटता दिखाता है और अपनी एकता विकसित करता है. यह एक प्रक्रिया है, एक संघर्ष है जो वर्षों की निष्क्रियता के बाद फिर से शुरू हो रहा है, यह सम्भावना जो वर्तमान हड़तालों से चलती है.” [3] कोई नहीं जानता कि कहाँ और कब महत्वपूर्ण नये संघर्ष खड़े होंगे, लेकिन यह तय है कि मजदूर वर्ग को हर जगह संघर्ष करते रहना होगा.

हम में से लाखों लोग लड़ रहे हैं, अपने वर्ग को सामूहिक शक्ति को महसूस कर रहे हैं. जब सड़कों पर कंधे से कंधा मिला कर खड़े हैं, यह आवश्यक है. लेकिन यह किसी भी तरह पर्याप्त नहीं है. सीपीई के खिलाफ संघर्ष के दौरान 2006 में फ्रांसीसी सरकार पीछे हट गई, इसलिए नहीं कि सडकों पर अनिश्चित अनुबंधों पर अधिक छात्र और युवा लोग थे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने संप्रभु, सभी के लिए खुली विशाल सभाओं के माध्यम से यूनियनों से आन्दोलन पर नियंत्रण ले लिया था. यह सभाएं ऐसी जगह नहीं हो रहीं थीं जहाँ मजदूर अपने ही क्षेत्र या कम्पनी तक सीमित थे, बल्कि, वे, वह जगहें थीं जहाँ से सक्रिय एकजुटता की तलाश के लिए बड़े पैमाने पर प्रतिनिधिमंडल निकटतम कम्पनियों के लिए रवाना हुए थे. आज, संघर्ष को सभी क्षेर्त्रों तक विस्तारित करने की चाह में मजदूर वर्ग की असमर्थता सक्रिय रूप से संघर्ष को हाथों में लेने में असमर्थ है. यही कारण है कि पूंजीपति वर्ग पीछे नहीं हटा है. हालाँकि, अपनी पहचान को पुन: प्राप्त करने से श्रमिक वर्ग अपने अतीत को पुन: हासिल करने में सक्षम हो गया है. फ़्रांस में मार्च में, “मई 6 और सीपीई के खिलाफ 2006 के संघर्ष का सन्दर्भ कई गुना बढ़ गया है.’ 68 में क्या हुआ था? 2006 में हमने सरकार को पीछे हटने के लिए मजबूर किया? वर्ग के अल्पसंख्यक वर्ग में, चिन्तन की प्रक्रिया चल रही है, जो पिछले वर्ष के आन्दोलन से सबक सीखने और भविष्य में संघर्षों की तैयारी करने का एक अनिवार्य साधन है, जिसे फ़्रांस में  1968 अथवा 1980 में पोलेंड के संघर्षों से भी आगे जाना होगा .         

जिस प्रकार, हाल के संघर्ष पिछले कुछ समय से विकसित हो रही , भूमिगत परपक्वता की प्रणाली का परिणाम है, उसी प्रकार हाल के संघर्षों से सबक सीखने के अल्पसंख्यकों के प्रयाश आगे आने वाले संघर्षों में फलदायी होंगे .मजदूर यह पहचानें कि यूनियनों द्वारा थोपे गये संघर्षों के अलगाव को केवल तभी दूर किया जा सकता है जब वे सामान्य सभाओं और निर्वाचित हड़ताल समितियों जैसे सन्गठन के स्वायात्व रूपों को फिर से खोज लें, और यदि वे संघर्ष को सभी कार्पोरेटी विभाजनों से परे बढ़ाने की पहल करें.                  

ए और डी. 23 अगस्त 2023

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[1] सीएफ. " विघटन पर थीसिस "; (मई 1990)", अंतर्राष्ट्रीय समीक्षा संख्या 107 (2001).
[2] देखें " अपघटन पर थीसिस का अद्यतन (2023) ", अंतर्राष्ट्रीय समीक्षा संख्या 170 (2023).
[3] " वर्ग संघर्ष पर रिपोर्ट 25वीं आईसीसी कांग्रेस ”, अंतर्राष्ट्रीय समीक्षा संख्या 170 (2023)