2026 की वसंत ऋतु के दौरान भारत के कई औद्योगिक क्षेत्रों में मज़दूरों के संघर्षों की एक महत्वपूर्ण लहर विकसित हुई। इसके शुरुआती प्रमुख केंद्रों में से एक मानेसर स्थित होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया (HMSI) का कारख़ाना था, जहाँ मज़दूरी और काम की परिस्थितियों को लेकर मज़दूरों के विरोध ने व्यापक लामबंदी को जन्म देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में यह संघर्ष फरीदाबाद, नोएडा, पानीपत, सूरत और अन्य औद्योगिक केंद्रों तक फैल गया। ये संघर्ष बढ़ती महँगाई, अपर्याप्त मज़दूरी, अस्थायी रोजगार और बदतर होती कामकाजी परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में उभरे।
भारतीय बुर्जुआ वर्ग देश को समकालीन पूँजीवाद की सबसे बड़ी सफलता-कथाओं में से एक के रूप में पेश करता है। वह आर्थिक विकास, औद्योगिक विस्तार और बढ़ते वैश्विक प्रभाव का ढिंढोरा पीटता है। लेकिन इस विजयी प्रचार के पीछे एक दूसरी हक़ीक़त छिपी हुई है। लाखों मज़दूरों के लिए इस "विकास" का मतलब है और अधिक शोषण, लंबे काम के घंटे और जीवन की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने में बढ़ती मुश्किलें।
यही वे परिस्थितियाँ थीं जिन्होंने हज़ारों मज़दूरों को संघर्ष के मैदान में उतरने के लिए मजबूर किया।
सिर्फ़ मज़दूरी का नहीं, उससे कहीं बड़ा संघर्ष
आंदोलन की तात्कालिक माँगें मज़दूरी और काम की परिस्थितियों पर केंद्रित थीं। हरियाणा में मज़दूर न्यूनतम मज़दूरी में एक दशक से अधिक समय बाद हुई पहली संशोधन वृद्धि के बावजूद संघर्ष में उतरे, क्योंकि वे समझते थे कि सरकारी बढ़ोतरी उनके जीवन-स्तर में आई वास्तविक गिरावट की भरपाई नहीं करती। जैसे-जैसे महँगाई उनकी आय को निगलती जा रही थी, वैसे-वैसे मज़दूर खुद को अपनी सबसे बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने में भी असमर्थ पाते जा रहे थे।
लेकिन जबकि संघर्ष की शुरुआत विशेष कार्यस्थलों या कंपनियों में मज़दूरी और काम की परिस्थितियों के सवालों से हुई थी, उसने बहुत जल्दी कुछ अधिक व्यापक वास्तविकता को उजागर कर दिया।
आंदोलन की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक थी मज़दूरों की अपने-अपने कार्यस्थलों की सीमाओं को तोड़कर बाहर निकलने की प्रवृत्ति। अलग-अलग कारख़ानों तक सीमित रहने के बजाय, मज़दूरों के समूह पड़ोसी उद्यमों के मज़दूरों तक सीधे पहुँचे और उन्हें संघर्ष में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।
हमने उन मज़दूरों को भी प्रदर्शनों में भाग लेते देखा जो बड़े औद्योगिक केंद्रों के मज़दूरों की तुलना में आम तौर पर कहीं अधिक बिखरे और अलग-थलग रहते हैं: छोटे उद्यमों के मज़दूर, घरेलू कामगार, अंशकालिक मज़दूर और बेरोज़गार मज़दूर आदि।
यह प्रवृत्ति बुनियादी महत्व रखती है।
मज़दूर वर्ग की ताक़त कभी भी अलग-अलग कार्यस्थलों के अलग-थलग प्रतिरोध में नहीं रही है। पूँजीवाद मज़दूरों का सामना एक वर्ग के रूप में करता है, और मज़दूर भी केवल एक वर्ग के रूप में संघर्ष करके ही प्रभावी ढंग से अपनी रक्षा कर सकते हैं। इसलिए विस्तार, एकजुटता और एकीकरण की दिशा में उठाया गया हर क़दम किसी एक संघर्ष की तात्कालिक माँगों से आगे जाता है और उन ऐतिहासिक तरीक़ों की ओर संकेत करता है जिनके माध्यम से सर्वहारा वर्ग अपनी सामूहिक शक्ति का विकास करता है।
चाहे ये प्रयास कितने ही सीमित और प्रारम्भिक क्यों न रहे हों, वे इस वास्तविकता की एक सहज और स्वाभाविक पहचान को व्यक्त करते थे।
राज्य ने इतनी बर्बर प्रतिक्रिया क्यों दी
सत्ता की प्रतिक्रिया ने साफ़ दिखा दिया कि वास्तविक दाँव पर क्या लगा हुआ था।
राज्य ने पुलिस तैनाती, गिरफ्तारियों, सभाओं पर पाबंदियों और कुछ मामलों में औद्योगिक क्षेत्रों के लगभग सैन्यीकरण के ज़रिए जवाब दिया। हमेशा की तरह मीडिया ने इन क़दमों को अव्यवस्था और अस्थिरता के ख़िलाफ़ ज़रूरी कार्रवाई के रूप में पेश किया।
लेकिन बुर्जुआ वर्ग को अलग-थलग पड़े श्रम विवादों से डर नहीं लगता। पूँजीवाद हमेशा से स्थानीय और सीमित संघर्षों को समायोजित करने और अपने दायरे में बाँधे रखने में सक्षम रहा है।
शासक वर्ग जिस चीज़ से डरता है, वह यह संभावना है कि मज़दूरों के संघर्ष किसी एक उद्यम, किसी एक क्षेत्र या किसी एक इलाके की सीमाओं को पार करने लगें; कि मज़दूर अपने साझा हितों को पहचानने लगें; कि सामूहिक प्रतिरोध वर्गीय एकजुटता के एक व्यापक आंदोलन में बदलने लगे।
इसलिए इन संघर्षों पर ढाया गया दमन बुर्जुआ वर्ग की ताक़त का नहीं, बल्कि उनमें छिपी संभावनाओं को लेकर उसकी बेचैनी का प्रमाण है। और केवल दमन ही आंदोलन को कुचलने के लिए पर्याप्त नहीं था। कई मामलों में कारख़ानों पर मज़दूरों के कब्ज़ों को ख़त्म करने के लिए की गई पुलिसिया बर्बरता ने दूसरे समूहों के मज़दूरों को आगे आकर हमले का सामना कर रहे मज़दूरों के समर्थन में खड़ा होने के लिए प्रेरित किया।
स्वतंत्र वर्गीय कार्रवाई की तलाश
इन आंदोलनों का एक और उल्लेखनीय पहलू ट्रेड यूनियनों, राजनीतिक दलों और राज्य संस्थाओं के प्रति बढ़ता अविश्वास था।
पूँजीवाद के पतनशील युग, अर्थात् पिछले सौ से भी अधिक वर्षों के दौरान, मज़दूरों ने अपने अनुभवों से बार-बार सीखा है कि ट्रेड यूनियनों और तथाकथित "वामपंथी" दलों जैसी वे संस्थाएँ जो उनके नाम पर बोलने का दावा करती हैं, वास्तव में उनकी लड़ाकू भावना को नियंत्रित करने और सीमित करने के औज़ार के रूप में काम करती हैं।
हालिया भारतीय संघर्षों में बार-बार ऐसे संकेत मिले कि मज़दूर ऊपर से दिए गए निर्देशों का आँख मूँदकर पालन करने के बजाय आंदोलन के विभिन्न पहलुओं पर स्वयं चर्चा करना और निर्णय लेना चाहते थे। कई मौकों पर, विशेष रूप से नोएडा और फरीदाबाद में, मज़दूरों ने आधिकारिक माध्यमों को दरकिनार कर आगे की दिशा तय करने के लिए अपनी सामूहिक चर्चाओं पर भरोसा किया।
इन घटनाक्रमों को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखना चाहिए।
आंदोलन महत्वपूर्ण कमज़ोरियों से भी चिह्नित था। मज़दूरों के बीच होने वाली चर्चाएँ आम तौर पर अनौपचारिक और बिखरी हुई रहीं। वे अभी तक उन संप्रभु आम सभाओं का रूप नहीं ले सकीं जो संघर्ष में शामिल सभी मज़दूरों को एकजुट कर सकें। न ही वे ऐसे निर्वाचित और किसी भी समय वापस बुलाए जा सकने वाले प्रतिनिधि पैदा कर सकीं जो आम सभाओं के प्रति जवाबदेह हों और जिन्हें विभिन्न कार्यस्थलों तथा क्षेत्रों में आंदोलन के समन्वय का जनादेश मिला हो।
ये सीमाएँ वास्तविक हैं। लेकिन इन्हें उस प्रवृत्ति के महत्व को छिपाने नहीं देना चाहिए जो इन संघर्षों के भीतर उभर रही थी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मज़दूर संघर्ष के विभिन्न पहलुओं को अपने हाथों में लेने की बढ़ती कोशिश कर रहे थे, बजाय इसके कि सब कुछ यूनियनों, राजनीतिक दलों या पेशेवर प्रतिनिधियों पर छोड़ दें। ऐसी प्रवृत्तियाँ आत्म-संगठन के उन रूपों की तलाश को व्यक्त करती हैं जो मज़दूर आंदोलन की ऐतिहासिक परंपराओं का अभिन्न हिस्सा हैं।
कारख़ानों पर कब्ज़े की सीमाएँ
इस आंदोलन ने कारख़ानों पर कब्ज़ों को भी जन्म दिया, एक ऐसा घटनाक्रम जिसने मौजूदा संघर्ष की ताक़तों और कमज़ोरियों, दोनों को उजागर किया।
एक ओर, इन कब्ज़ों ने मज़दूरों की लड़ाकू भावना, उनके दृढ़ संकल्प और सामूहिक कार्रवाई पर बढ़ते भरोसे को व्यक्त किया। उन्होंने यह दिखाया कि मज़दूर मालिकों और राज्य के फ़रमानों के सामने चुपचाप झुक जाने के लिए तैयार नहीं हैं।
दूसरी ओर, मज़दूर आंदोलन के ऐतिहासिक अनुभव से पता चलता है कि कारख़ानों पर कब्ज़ा संघर्ष के विकास का कोई टिकाऊ या दीर्घकालिक रास्ता नहीं बन सकता।
अक्सर ऐसा होता है कि कार्यस्थल पर कब्ज़ा कारख़ाने को ही एक तरह की जेल में बदल देता है। किसी एक उद्यम की चारदीवारी के भीतर सीमित रह जाने पर मज़दूर अपने वर्ग के बाकी हिस्सों से कट सकते हैं और दमन के सामने अधिक असुरक्षित हो सकते हैं। दूसरी तरफ़ पूँजी कहीं अधिक व्यापक स्तर पर संगठित रहती है।
सर्वहारा वर्ग की वास्तविक ताक़त कहीं और निहित है। वह सभी मज़दूरों के लिए खुली व्यापक आम सभाओं में निहित है; निर्वाचित और किसी भी समय वापस बुलाए जा सकने वाले प्रतिनिधियों में; चर्चा, समन्वय और अलग-अलग कार्यस्थलों, क्षेत्रों तथा इलाक़ों की सीमाओं से आगे बढ़कर संघर्ष को फैलाने की क्षमता में निहित है।
इसलिए भारत में सबसे महत्वपूर्ण बात अपने आप में कारख़ानों पर कब्ज़ा नहीं थी, बल्कि यह प्रवृत्ति थी कि मज़दूर कारख़ानों की सीमाओं से बाहर निकलकर दूसरे मज़दूरों तक पहुँचने और उनके साथ एकजुटता कायम करने की कोशिश कर रहे थे।
भारत और वर्ग संघर्ष का अंतरराष्ट्रीय विकास
इन संघर्षों को व्यापक अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
2022 में ब्रिटेन में फूटी हड़तालों की लहर के बाद अनेक देशों में मज़दूरों की महत्वपूर्ण लामबंदियाँ देखने को मिली हैं। फ़्रांस में पेंशन सुधारों के ख़िलाफ़ आंदोलन, बेल्जियम और जर्मनी में मज़दूरों के संघर्ष, संयुक्त राज्य अमेरिका में हड़तालें, स्पेन में एयरबस मज़दूरों की लामबंदी, फ़्रांस में हाई स्कूल और विश्वविद्यालय छात्रों का हालिया आंदोलन और अनेक अन्य संघर्ष एक ही बुनियादी वास्तविकता से पैदा हुए हैं: पूँजीवाद का गहराता संकट और मेहनतकश वर्ग की जीवन-स्थितियों पर उसका विनाशकारी असर।
अपने रूपों और विकास के स्तर में भिन्न होने के बावजूद, ये सभी आंदोलन एक साझा प्रवृत्ति को व्यक्त करते हैं: अपने जीवन और काम की परिस्थितियों पर लगातार बढ़ते हमलों के सामने सर्वहारा वर्ग का फिर से सामूहिक संघर्ष के रास्ते पर लौटना। फ़्रांस का युवा आंदोलन विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि उसके भीतर आम सभाओं, सामूहिक चर्चा, पिछले संघर्षों से सबक निकालने और मज़दूरों से संबंध स्थापित करने की प्रवृत्तियाँ उभरीं। इसने एक बार फिर स्पष्ट किया कि पूँजीवादी मितव्ययिता और हमलों के ख़िलाफ़ संघर्ष अपनी पूरी ताक़त केवल तब हासिल कर सकता है जब वह व्यापक मेहनतकश वर्ग से जुड़ जाए।
वर्गीय पहचान के पीछे हटने, पूर्वी ब्लॉक के पतन के बाद चलाए गए वैचारिक अभियानों और सामाजिक विघटन के संक्षारक प्रभावों से चिह्नित दशकों के बाद, भौतिक परिस्थितियाँ एक बार फिर मज़दूरों को अपनी जीवन-स्थितियों की रक्षा के लिए सामूहिक संघर्ष की ओर धकेल रही हैं।
भारत के संघर्ष इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
वे किसी क्रांतिकारी परिस्थिति के उभरने का प्रतिनिधित्व नहीं करते। वे अभी भी नाज़ुक हैं, असमान हैं और अनेक कमज़ोरियों से ग्रस्त हैं। लेकिन इसके बावजूद वे एक महत्वपूर्ण बात को व्यक्त करते हैं: अपने स्वतंत्र वर्गीय धरातल पर सर्वहारा वर्ग की लगातार होती पुनः उपस्थिति।
बुर्जुआ राजनीतिक धरातल के विरुद्ध
इन संघर्षों का महत्व तब और अधिक स्पष्ट हो जाता है जब इन्हें उन राजनीतिक आंदोलनों के बरक्स रखा जाए जो भारत और दुनिया भर में मीडिया का अधिकांश ध्यान अपनी ओर खींचते हैं।
जबकि मज़दूरों के संघर्षों को या तो नज़रअंदाज़ कर दिया गया या केवल "कानून और व्यवस्था" के सवाल तक सीमित कर दिया गया, वहीं पूरा मीडिया ध्यान कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा संगठित लामबंदियों पर केंद्रित था, जो पूरी तरह बुर्जुआ राजनीति और संसदीय ढाँचे के भीतर संचालित होती हैं।[1]
यह विरोधाभास कोई संयोग नहीं है।
जो आंदोलन चुनावों, संवैधानिक सुधारों या बुर्जुआ गुटों के बीच प्रतिस्पर्धा तक सीमित रहते हैं, वे श्रम और पूँजी के बीच मौजूद मूल सामाजिक संबंध को चुनौती नहीं देते। वे राजनीतिक समीकरणों को बदल सकते हैं, लेकिन शोषण की पूँजीवादी नींव को ज्यों का त्यों बनाए रखते हैं।
मज़दूरों के संघर्ष अलग प्रकृति के होते हैं।
वे कार्यस्थलों से जन्म लेते हैं। वे श्रम और पूँजी के बीच मौजूद टकराव से पैदा होते हैं। वे, भले ही अप्रत्यक्ष रूप से, उस शोषित वर्ग के सामूहिक प्रतिरोध का प्रश्न उठाते हैं जिसे पूँजीवादी व्यवस्था अपनी शर्तों पर जीने को मजबूर करती है।
इसी कारण, मज़दूरों का एक सीमित संघर्ष भी अपनी तात्कालिक माँगों से कहीं अधिक व्यापक ऐतिहासिक महत्व रखता है।
एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण क़दम
भारत के हालिया संघर्षों का न तो महिमामंडन किया जाना चाहिए और न ही उन्हें कम करके आँका जाना चाहिए।
वे अब भी महत्वपूर्ण कमज़ोरियों से ग्रस्त हैं। आत्म-संगठन के उनके रूप सीमित थे। संघर्ष को फैलाने की उनकी क्षमता आंशिक ही रही। यूनियनों का प्रभाव, बिखराव और राजनीतिक भ्रम अब भी गंभीर बाधाएँ बने हुए हैं।
फिर भी, इन सीमाओं के नीचे कुछ महत्वपूर्ण उभरता हुआ दिखाई दिया।
मज़दूरों ने अपने संघर्ष को अलग-अलग कार्यस्थलों की सीमाओं से बाहर फैलाने की कोशिश की। उन्होंने उन संस्थाओं पर बढ़ता अविश्वास दिखाया जो उनके प्रतिनिधि होने का दावा करती हैं। उन्होंने, भले ही झिझकते हुए, सामूहिक रूप से चर्चा करने और कार्रवाई करने का प्रयास किया। उन्होंने बिगड़ती जीवन-स्थितियों का प्रतिरोध करने और दूसरे मज़दूरों के साथ एकजुटता कायम करने की इच्छा दिखाई।
ये घटनाक्रम एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
आगे का रास्ता अभी लंबा है। कठिनाइयाँ भी बेहद बड़ी हैं। लेकिन भारत के हालिया संघर्षों का महत्व ठीक इसी बात में है कि उन्होंने, चाहे सीमित रूप में ही सही, उन बुनियादी प्रवृत्तियों के फिर से उभरने को सामने रखा है जिनके माध्यम से मज़दूर वर्ग अपनी सामूहिक शक्ति को दोबारा खोजता है।
इसी अर्थ में भारत के संघर्ष सिर्फ़ औद्योगिक अशांति का एक और प्रकरण नहीं हैं। वे पूँजीवाद के गहराते संकट के सामने अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के धीमे, असमान लेकिन वास्तविक पुनर्जागरण की उन अनेक अभिव्यक्तियों में से एक हैं जो आज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई दे रही हैं।
बीएन
[1] हमारा लेख कॉकरोच जनता पार्टी: मज़दूर वर्ग के ख़िलाफ़ एक बुर्जुआ आंदोलन
अनुवाद का स्रोत: An expression of the international revival of class struggle