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अभी तक ज्ञात सर्वाधिक लम्‍बे और गहरे प्रतिक्रांति काल के बाद सर्वहारा एक बार ‍िफर वर्ग संघर्ष की राह पा रहा है। यह संघर्ष पहले ही वर्ग द्वारा आज तक लड़े गये संघर्षो में सर्वा‍‍घिक व्‍यापक है। यह छठे दशक के मध्‍य से विकसित हो रहे व्‍यवस्‍था के तीव्र संकट और पुरानी हारों से अपने पूर्वजों की बजाय कम दबी मज़दूरों की नई पीढियों के उदय का नतीजा है। फ्रांस की 1968 की घटनाओं के समय से दुनियॉं भर (इटली, अर्जेन्टीना, ब्रिटेन, पोलैंड, स्‍वीडन, मिश्र, चीन, पुर्तगाल, अमेरिका, भारत और जपान से लेकर स्‍पेन तक के) के मज़दूर संघर्ष पूँजीपति वर्ग के लिए दु:स्‍वप्‍न बन गये हैं। मज़दूर वर्ग के इतिहास मंच पर पुन: प्रकटन ने प्रतिक्रांति द्वारा उत्‍पन्‍न अथवा संभव बनी उन सब विचारधाराओं का नि‍‍‍‍‍‍श्‍चत रूप से खण्‍डन कर दिया है जिन्‍होंने सर्वहारा के क्रांतिकारी चरित्र को नकारने की कोशिश की। वर्ग संघर्ष के वर्तमान पुन: उभार ने ठोस रूप से यह सिद्ध कर दिया है कि सर्वहारा ही हमारे युग का एकमात्र क्रांतिकारी वर्ग है।

1929 – 2008 पूँजीवाद दिवालिया है!

1929 – 2008 पूँजीवाद दिवालिया है! एक बेहतर दुनिया - कम्युनिज्म- संभव है! राजनेताओं तथा अर्थशास्त्रियों के पास अब स्थिति की संगीनता ब्यान करने के लिए शब्द नहीं हैं: "अंधी खायी का कगार” , "आर्थिक पर्ल हार्बर”, "एक आर्थिक सुनामी”, "वित्तीय व्यवस्थाका 9/11” ....केवल टाईटैनिक के डूबने का जिक्र बाकी है. आखिर क्या हो रहा है? अनावरत होते आर्थिक तुफान के समक्ष अनेक कष्टदायक सवाल उठ रहे हैं. क्या हम 1929 जैसे एक और आर्थिक पतन में से गुज़र रहे हैं? यह सब कैसे हुआ? हम अपने बचाव के लिए क्या कर सकते हैं? और यह कैसी दुनिया है जिस में हम जी रहे हैं?

रुसी इंकलाब का पतन

1917 का रुसी इंकलाब पहले वि‍श्‍वयुद्व में उभरी सर्वहारा क्रांति‍ की वि‍श्‍व क्रांति‍कारी लहर का सर्वोच्‍च बि‍न्‍दू था। पूंजीवादी चढाव से पतनशीलता के मोड पर स्‍थि‍त यह वह घड़ी थी जब मज़दूर वरग ने रुस में पूंजी की सत्‍ता को उखाड फेंका। उसने पूंजी तथा श्रम में वि‍श्‍वव्‍यापी मुठभेडों का द्वार खोला। इस अर्थ में यह मज़दूर वरग का अब तक का सर्वाधि‍क समृद्द तजरूबा था। पर रूसी इंकलाब अलग-थलग पड गया और 1925-26 के आते आते अद्यःपतन का शि‍कार हो गया। रूस में पूंजीवाद ने राज्‍यपूंजीवाद के अति‍ भौंडे तथा विकृत रूप, स्‍तालि‍नवाद, का रूप लि‍या। आगामी सात दशकों तक स्‍तालि‍नवाद को एक तरफ मज़दूर वरग को कुचलने के लि‍ए इस्‍तेमाल कि‍या गया। दूसरी ओर उसे मज़दूर वरग को गुमराह करने तथा साम्‍यवाद के मुक्‍ति‍कामी वि‍चारों को बदनाम करने के लि‍ए इस्‍तेमाल कि‍या जाता रहा। और 1989 से स्‍तालि‍नवाद के पतन को मज़दूर वरग के खि‍लाफ एक नए अभि‍यान के लि‍ए प्रयोग कि‍या जा रहा है...

‘चीनी क्रान्ति’ पर

आधि‍कारक इति‍हास मुताबि‍क 1948 में चीन में लोकप्रिय इंकलाब विजयी रहा। जनतंत्रवादी पश्‍चि‍म एवम माओवादी दोनो इस वि‍चार के बराबर पक्षधर हैं। यह स्‍तालि‍नवादी प्रति‍क्रांति‍ जनि‍त तथाकथि‍त “समाजवादी देशों” की रचना वि‍षयक वि‍शाल भ्रमजाल का हि‍स्‍सा है। यह तय है कि‍ 1919 और 1927 के बीच चीन महत्‍वपूर्ण मज़दूर आंदोलन में से गुज़रा जो उस बक्‍त दुनि‍या को हि‍लाती अंतर्राष्‍ट्रीय लहर का अभि‍न्‍न हि‍स्‍सा था। पर यह आंदोलन मज़दूर वरग के संहार द्वारा डूबो दि‍या गया। पूंजीवादी प्रचारक जि‍से “चीनी इंकलाब की वि‍जय” के रूप में पेश करते हैं वह केवल राज्‍यपूंजीवादी शासन के माओवादी रूप की स्‍थापना थी। यह सर्वहारा क्रांति‍ की हार के बाद 1928 से चीन में भडके साम्राज्‍यवादी युद्व के दौर का चरम था।

2003 का इराक युद्ध

एक बार फि‍र मध्‍यपूर्व आतंक की गि‍रफ्त में है। एक बार फिर इराक पर बंमों की आग बरसाई जा रही है। एक तरफ “सभ्‍य” ताकतें पहले ही भुखमरी की शि‍कार आबादी पर मौत तथा बदहाली बरपा कर रही हैं। दूसरी ओर सारी दुनि‍या को झूठों की बाढ में डुबोया जा रहा है। ताकि‍ जंग उचि‍त ठहराई जा सके। ताकि‍ जंग के हर सच्‍चे वि‍रोध को वि‍कृत तथा भ्रमि‍त कि‍या जा सके।…

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